वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउचित है। अथवा तीव्र इच्छा हो तो दूसरे प्रकारसे - ब्रह्मचर्यसे, गृहस्थसे या वानप्रस्थसे संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिये। जिस दिन पूर्ण वैराग्य हो जाय, उसी दिन संन्यास ले लेना चाहिये।' इसी प्रकार अन्यान्य श्रुतियोंमें भी आश्रमोंके लिये विधि देखी जाती है। अतः जहाँ केवल सांकेतिकरूपसे आश्रमोंका वर्णन हो, वहाँ संकेतसे ही उनकी विधि भी मान लेनी चाहिये। यहाँ यह बात भी ध्यानमें रखनी चाहिये कि कर्मत्यागका निषेध करनेवाली जो श्रुति है, वह कर्मासक्त मनुष्योंके लिये ही है, विरक्तके लिये नहीं है। इस विवेचनसे यह सिद्ध हो गया कि कर्मोंके बिना केवल ज्ञानसे ही ब्रह्मप्राप्तिरूप परम पुरुषार्थकी सिद्धि होती है। सम्बन्ध - पूर्व प्रकरणमें संन्यास-आश्रमकी सिद्धि की गयी। अब यज्ञकर्मके अंगभूत उद्गीथ आदिमें की जानेवाली जो उपासना है, उसकी तथा उसके लिये बताये हुए गुणोंकी विधेयता सिद्ध करके विद्या कर्मोंका अंग नहीं है यह सिद्ध करनेके उद्देश्यसे अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है- स्तुतिमात्रमुपादानादिति चेन्नापूर्वत्वात् ॥ ३।४।२१॥ चेत् = यदि कहो; उपादानात् = उद्गीथ आदि उपासनाओंमें जो उनकी महिमाके सूचक वचन हैं, उनमें कर्मके अंगभूत उद्गीथ आदिको लेकर वैसा वर्णन किया गया है, इसलिये; स्तुतिमात्रम् = वह सब, केवल उनकी स्तुतिमात्र हैं; इति न = तो ऐसी बात नहीं है; अपूर्वत्वात् = क्योंकि वे उपासनाएँ और उनके रसतमत्व आदि गुण अपूर्व हैं। व्याख्या - यदि कहो कि 'यह जो उद्गीथ है वह रसोंका भी उत्तम रस है, परमात्माका आश्रयस्थान और पृथिवी आदि रसोंमें आठवाँ सर्वश्रेष्ठ रस है।' (छा० उ० १।१।३) इस प्रकारसे जो उद्गीथके विषयमें वर्णन है, वह केवल स्तुतिमात्र है; क्योंकि यज्ञके अंगभूत उद्गीथको लेकर ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार सभी कर्मांगभूत उपासनाओंमें जिन-जिन विशेष गुणोंका वर्णन है वह सब उस-उस