भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 486 में से

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पृष्ठ 385

३८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सूचित किया है, उनका तात्पर्य दूसरा ही है। वहाँ अग्निहोत्रका त्याग न करनेपर जोर दिया गया है। यह बात उन्हीं लोगोंपर लागू होती है जो उसके अधिकारी हैं। गृहस्थ और वानप्रस्थ-आश्रमोंमें रहते हुए कभी अग्निहोत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। यही बताना श्रुतिको अभीष्ट है। इस प्रकार संतान-परम्पराको उच्छेद न करनेका आदेश भी उन्हींके लिये है, जो पूर्णतः विरक्त नहीं हुए हैं। विरक्तके लिये तो तत्काल संन्यास लेनेका विधान श्रुतिमें स्पष्ट देखा जाता है। यथा—'यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत्।' अर्थात् 'जिस दिन वैराग्य हो, उसी दिन संन्यास ले ले।' अतः संन्यासीका भी ब्रह्मविद्यामें अधिकार होनेके कारण विद्याको कर्मका अंग न मानना ही ठीक है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— विधिर्वा धारणवत् ॥ ३।४।२० ॥ वा=अथवा; विधिः=उक्त मन्त्रमें अन्य आश्रमोंकी विधि ही माननी चाहिये, अनुवाद नहीं; धारणवत्=जैसे समिधा-धारण-सम्बन्धी वाक्यमें 'ऊपर धारण' की क्रियाको अनुवाद न मानकर विधि ही माना गया है। व्याख्या—जैसे—'अधस्तात् समिधं धारयन्ननुद्रवेदुपरि हि देवेभ्यो धारयति।' अर्थात् 'स्रुग्दण्डके नीचे समिधा-धारण करके अनुद्रवण करे, किंतु देवताओंके लिये ऊपर धारण करे।' इस वाक्यमें स्रुग्दण्डके अधोभागमें समिधा-धारणकी विधिके साथ एकवाक्यताकी प्रतीति होनेपर 'ऊपर धारण' की क्रियाको अपूर्व होनेके कारण विधि मान लिया गया है। उसी प्रकार पूर्वोक्त श्रुतिमें जो चारों आश्रमोंका सांकेतिक वर्णन है, उसे अनुवाद न मानकर विधि ही स्वीकार करना चाहिये। दूसरी श्रुतिमें आश्रमोंका विधान करनेवाले वचन स्पष्ट मिलते हैं। यथा—'ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य गृही भवेत्। गृही भूत्वा वनी भवेत्। वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा। ......'यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत्।' (जाबा० उ० ४) अर्थात् 'ब्रह्मचर्यको पूर्ण करके गृहस्थ होना चाहिये। गृहस्थको वानप्रस्थ होकर उसके बाद संन्यासी होना