वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३९८ \t वेदान्त-दर्शन \t [ पाद ४ हो परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं, उन सर्वसमर्थ भगवान्को नमस्कार है' (श्रीमद्भा० २। ४। १८)। इन सब वचनोंसे यह सिद्ध होता है कि उपासनासम्बन्धी धर्मोंका अनुष्ठान ही परम आवश्यक है। सम्बन्ध— अब भागवतधर्मानुष्ठानका विशेष माहात्म्य सिद्ध करते हैं— विशेषानुग्रहश्च ॥ ३।४।३८ ॥ च = इसके सिवा; विशेषानुग्रहः = भगवान्की भक्तिसम्बन्धी धर्मोंका पालन करनेसे भगवान्का विशेष अनुग्रह होता है। व्याख्या— ऊपर बतलायी हुई अन्य सब बातें तो भागवतधर्मकी विशेषतामें हेतु हैं ही। उनके सिवा, यह एक विशेष बात है कि अन्य किसी प्रकारके धर्म-कर्म आदिका आश्रय न लेकर जो अनन्य-भावसे केवल भगवान्की भक्तिका अनुष्ठान करता है,* उसको भगवान्की विशेष कृपा प्राप्त होती है। गीतामें भगवान्ने स्वयं कहा है कि 'उन भक्तोंके लिये मैं सुलभ हूँ' (गीता ८। १४)', 'उनका योग-क्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ' (९।२२)। भगवान्ने अपने भक्तोंका महत्त्व बतलाते हुए श्रीमद्भागवतमें यहाँतक कह दिया है कि 'मैं सदा भक्तोंके अधीन रहता हूँ' (९।४।६३)। इसके सिवा इतिहास, पुराण और स्मृतियोंमें यह वर्णन विशेषरूपसे पाया जाता है कि भक्तिका अनुष्ठान करनेवालोंपर भगवान्की विशेष कृपा होती है। यही कारण है कि भगवान्के इस भक्तवत्सल स्वभावको जाननेवाले निरन्तर उनके भजन, स्मरणमें ही लगे रहते हैं (गीता १५। १९) तथा वे भक्तजन मुक्तिका भी निरादर करके केवल भक्ति ही चाहते हैं।
- भक्तिका वर्णन श्रीमद्भागवतमें इस प्रकार आया है— श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥ (७।५।२३) 'भगवान् विष्णुका श्रवण, कीर्तन, स्मरण, चरणसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन—ये भगवद्भक्तिके नौ भेद हैं।' (इन्हींको नवधा भक्ति कहते हैं।)