वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३७ ] अध्याय ३ ३९७ परमात्माकी सेवा-समाराधना करनी चाहिये। उन परमेश्वरकी ही शरण लेकर उन्हींमें अपने-आपको विलीन कर देना चाहिये। ऐसा करनेसे तुम्हारे पूर्वकृत समस्त संचित कर्म साधनमें विघ्नकारक नहीं होंगे' (श्वेता० उ० २।७)। इसके बाद इसका फल आत्मा और परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार बताया है (२।१४, १५)। इसी तरह अन्य श्रुतियोंमें भी केवल उपासनासे ही परमात्माकी प्राप्ति बतायी है। (श्वेता० उ० ४।१७ तथा ६।२३) इससे यह सिद्ध होता है कि जो अन्य वर्णाश्रमधर्मोंका पालन करनेमें असमर्थ हैं, उनको केवल उपासनाके धर्मोंका पालन करनेसे ही परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। सम्बन्ध — इसी बातके समर्थनमें स्मृतिका प्रमाण देते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ ३।४।३७॥ अपि च=इसके सिवा; स्मर्यते=स्मृतियोंमें भी यही बात कही गयी है। व्याख्या — गीता आदि स्मृतियोंमें जो वर्णाश्रमोचित कर्मके अधिकारी नहीं हैं, ऐसे पापयोनि चाण्डाल आदिको भी भगवान्की शरणागतिसे परमगतिकी प्राप्ति बतलायी गयी है (गीता ९।३२)। वहाँ भगवान्ने यह स्पष्ट कहा है कि 'मेरी प्राप्तिमें वेदाध्ययन, यज्ञानुष्ठान, दान तथा नाना प्रकारकी क्रिया और उग्र तप हेतु नहीं है, केवलमात्र अनन्यभक्तिसे ही मैं जाना, देखा और प्राप्त किया जा सकता हूँ' (११।४८, ५३, ५४)। इसी प्रकार श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थोंमें भी जगह-जगह इस बातका समर्थन किया गया है कि वर्ण और आश्रमकी मर्यादासे रहित मनुष्य केवल भक्तिसे पवित्र होकर परमात्माको प्राप्तकर लेता है। यथा — किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कसा आभीरकंका यवनाः खसादयः। येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः शुद्ध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥ 'किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन, खस आदि तथा अन्य जितने भी पापयोनिके मनुष्य हैं, वे सब जिनकी शरण लेनेसे शुद्ध