वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 399, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें३९६ वेदान्त-दर्शन [पाद ४ अभिभूत नहीं है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें की हुई हैं, जो अन्य सभी क्रिया- कलापसे उपरत है, सब प्रकारके शारीरिक और मानसिक सुख-दुःखोंको सहन करनेमें समर्थ-तितिक्षु है तथा परमात्माके स्मरणमें तल्लीन है, वह अपने हृदयमें स्थित उस आत्मस्वरूप परमेश्वरका साक्षात्कार करता है; अतः वह समस्त पापोंसे पार हो जाता है, उसे पाप ताप नहीं पहुँचा सकते; अपितु वही पापोंको संतप्त करता है।' इत्यादि (बृह० उ० ४।४।२३)। इस प्रकार श्रुतिमें भगवान्का भजन-स्मरण करनेवालेको पाप नहीं दबा सकते, यह बात कही गयी है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि परमात्माकी प्राप्तिके लिये बतलाये हुए जो उपासनाविषयक श्रवण, कीर्तन और स्मरण आदि धर्म हैं, उनका अनुष्ठान तो प्रत्येक परिस्थितिमें करते ही रहना चाहिये। सम्बन्ध- प्रकारान्तरसे पुनः उपासनाविषयक कर्मानुष्ठानकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं- अन्तरा चापि तु तद्दृष्टेः ॥ ३ । ४ । ३६ ॥ तु=इसके सिवा; अन्तरा=आश्रमधर्मोंके अभावमें; च अपि=भी (केवल उपासनाविषयक अनुष्ठानसे परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है), तद्दृष्टेः=क्योंकि श्रुतिमें ऐसा विधान देखा जाता है। व्याख्या- श्वेताश्वतरोपनिषद् (१। १४)-में कहा है- स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्। ध्याननिर्मथनाभ्यासाद् देवं पश्येन्निगूढवत् ॥ 'अपने शरीरको नीचेकी अरणि और प्रणवको ऊपरकी अरणि बनाकर ध्यानके द्वारा निरन्तर मन्थन करते रहनेसे साधक छिपी हुई अग्निकी भाँति हृदयमें स्थित परमदेव परमेश्वरको देखे।' इस कथनके पश्चात् उपर्युक्तरूपसे परमेश्वरमें ध्यानकी स्थितिके लिये प्रार्थना करने तथा उन्हीं परमात्माकी शरण ग्रहण करनेका भी वर्णन है (श्वेता० उ० २।१ से ५)। तदनन्तर यह कहा गया है कि 'हे साधक! सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक सर्वान्तर्यामी परमेश्वरकी प्रेरणासे तुम्हें उन परब्रह्म