वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 406, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ४४-४५ ] अध्याय ३ ४०३ स्वामिनः फलश्रुतेरित्यात्रेयः ॥ ३ । ४ । ४४ ॥ स्वामिनः=उस उपासनामें यजमानका ही कर्तापन है; इति=ऐसा; आत्रेयः=आत्रेय मानते हैं; फलश्रुतेः=क्योंकि श्रुतिमें यजमानके लिये ही फलका वर्णन किया गया है। व्याख्या—आत्रेय ऋषि मानते हैं कि श्रुतिमें 'जो इस उपासनाको इस प्रकार जानता है, वह पुरुष वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है, उसके लिये वर्षा होती है, वह वर्षा करानेमें समर्थ होता है।' (छा० उ० २। ३।२) बृहदारण्यकोपनिषद्में प्रस्तोताद्वारा की जानेवाली अनेक प्रार्थनाओंका उल्लेख करके अन्तमें उद्गाताका कर्म बताते हुए कहा है कि 'उद्गाता अपने या यजमानके लिये जिसकी कामना करता है, उसका आगान करता है' (बृह० उ० १।३।३८)। इस प्रकार फलका वर्णन करनेवाली श्रुतियोंसे सिद्ध होता है कि यज्ञके स्वामीको उसका फल मिलता है, अतएव इन फल-कामनायुक्त उपासनाओंका कर्तापन भी स्वामीका अर्थात् यजमानका ही होना उचित है। सम्बन्ध — इसपर दूसरे आचार्यका मत कहते हैं- आर्त्विज्यमित्यौडुलोमिस्तस्मै हि परिक्रीयते ॥ ३ । ४ । ४५ ॥ आर्त्विज्यम्=कर्तापन ऋत्विक्का है; इति=ऐसा; औडुलोमिः=औडुलोमि आचार्य मानते हैं; हि=क्योंकि; तस्मै = उस कर्मके लिये, परिक्रीयते = वह ऋत्विक् यजमानद्वारा धनदानादिसे वरण कर लिया जाता है। व्याख्या- आचार्य औडुलोमि ऐसा मानते हैं कि कर्तापन यजमानका नहीं, किंतु ऋत्विक्का ही है; तथापि फल यजमानको मिलता है, क्योंकि वह ऋत्विक् उस कर्मके लिये यजमानके द्वारा धनदानादिसे वरण कर लिया जाता है। अतः वह दाताद्वारा दी हुई दक्षिणाका ही अधिकारी है; उसका फलमें अधिकार नहीं है। सम्बन्ध - सूत्रकार श्रुतिप्रमाणसे अपनी सम्मति प्रकट करते हैं-