भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 407, कुल 486 में से

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पृष्ठ 407

४०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ श्रुतेश्च ॥ ३ । ४ । ४६ ॥ श्रुतेः=श्रुतिप्रमाणसे; च=भी (औडुलोमिका ही मत उचित सिद्ध होता है) । व्याख्या—यज्ञका ऋत्विक् जो कुछ भी कामना करता है, वह निःसंदेह यजमानके लिये ही करता है (शत० १।३।१।१६), इसलिये इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता यजमानसे कहे कि 'मैं तेरे लिये किन-किन भोगोंका आगान करूँ' (छा० उ० १।७।८) इत्यादि श्रुतियोंसे भी कर्मका कर्तापन ऋत्विक्का और फलमें अधिकार यजमानका सिद्ध होता है। सम्बन्ध—इस प्रकार प्रसंगानुसार सकाम उपासनाके फल और कर्तापनका निर्णय किया गया। अब ब्रह्मविद्याका अधिकार किसी एक ही आश्रममें है या सभी आश्रमोंमें? इस बातका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— सहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विध्यादिवत् ॥ ३ । ४ । ४७ ॥ तद्वतः=ब्रह्मविद्यासम्बन्धी साधनयुक्त साधकके लिये; तृतीयम्= बालकपन और पाण्डित्यके साथ कहा हुआ जो तीसरा मौन साधन है, वह विधेय है; सहकार्यन्तरविधिः=(क्योंकि) उसका दूसरे सहकारी साधनके रूपमें विधान है; विध्यादिवत्=दूसरे स्थलमें कहे हुए विधिवाक्योंकी भाँति; पक्षेण=एक पक्षको लेकर यह भी विधि है। व्याख्या—कहोलने याज्ञवल्क्यसे साक्षात् परब्रह्मका स्वरूप पूछा; उसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने सबके अन्तरात्मा परमात्माका स्वरूप संकेतसे बताकर कहा कि 'जो शोक, मोह, भूख, प्यास, बुढ़ापा और मृत्युसे अतीत है, वह परमात्मा है, ऐसे इस परमात्माको जानकर ब्राह्मण पुत्रकामना, धन- कामना तथा मान-बड़ाई और स्वर्गसम्बन्धी लोककामनासे विरक्त होकर भिक्षासे निर्वाह करनेवाले मार्गसे विचरता है।' इसके बाद इन तीनों कामनाओंकी एकता करके कामनामात्रको त्याज्य बताया और अन्तमें कहा कि 'वह ब्राह्मण उस पाण्डित्यको भलीभाँति समझकर बाल्यभावसे