भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 486 में से

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पृष्ठ 408

सूत्र ४८ ] अध्याय ३ ४०५ स्थित रहनेकी इच्छा करे, फिर उससे भी उपरत होकर मुनि हो जाय, फिर वह मौन और अमौन—दोनोंसे उपरत होकर ब्राह्मण हो जाता है अर्थात् ब्रह्मको भलीभाँति प्राप्त हो जाता है' इत्यादि (बृह० उ० ३।५।१)। इस प्रकरणमें संन्यास-आश्रममें परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन किया गया। इस वर्णनमें पाण्डित्य और बाल्यभावके अन्तमें तो 'तिष्ठासेत्' (स्थित रहनेकी इच्छा करे) यह विधिवाक्य है, परंतु मुनि शब्दके बाद कोई विधि नहीं है, इसलिये सूत्रकारका कहना है कि जिस प्रकार अन्यत्र कहे हुए वचनोंमें स्पष्ट विधिका प्रयोग न होनेपर सहकारीभावसे एकके लिये प्रयुक्त विधिवाक्य दूसरेके लिये भी मान लिये जाते हैं, वैसे ही यहाँ भी पाण्डित्य और बाल्यभाव—इन दो सहकारी साधनोंसे युक्त साधकके प्रति उनके साथ कहे हुए इस तीसरे साधन मुनिभावके लिये भी विधिवाक्यका प्रयोग पक्षान्तरसे समझ लेना चाहिये। ध्यान रहे, इस प्रकरणमें आये हुए बाल्यभावसे तो दम्भ, मान आदि विकारोंका अभाव दिखाया गया है और मननशीलताको मौन कहा गया है। अतः ब्रह्मका शास्त्रीय ज्ञान (पाण्डित्य), उक्त विकारोंका अभाव (बाल्य- भाव) और निरन्तर मनन तथा निदिध्यासन (मौन) इन तीनोंकी परिपक्व- अवस्था होनेसे ही ब्रह्मसाक्षात्कार होता है, यही इस प्रकरणका भाव है। सम्बन्ध—पूर्व सूत्रमें जिस प्रकरणपर विचार किया गया है; वह संन्यास- आश्रमका द्योतक है, अतः यह जिज्ञासा होती है कि संन्यास-आश्रममें ही ब्रह्मविद्याका साधन हो सकता है या अन्य आश्रमोंमें भी उसका अधिकार है। यदि संन्यास-आश्रममें ही उसका साधन हो सकता है तो (छा० उ० ८।१५। १ की) श्रुतिमें गृहस्थ-आश्रमके साथ-साथ ब्रह्मविद्याका प्रकरण क्यों समाप्त किया गया है। वहाँके वर्णनसे तो गृहस्थका ही अधिकार स्पष्टरूपसे सूचित होता है, अतः इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं— कृत्स्नभावात्तु गृहिणोपसंहारः ॥ ३।४।४८॥ कृत्स्नभावात्=गृहस्थ-आश्रममें सम्पूर्ण आश्रमोंका भाव है, इसलिये;