वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ तु = ही; गृहिणा = (उस प्रकरणमें) गृहस्थ आश्रमके साथ; उपसंहारः = ब्रह्म- विद्याके प्रकरणका उपसंहार किया गया है। व्याख्या-गृहस्थ-आश्रमके चारों आश्रमोंका भाव है; क्योंकि ब्रह्मचारी भी गृहस्थ-आश्रममें स्थित गुरुके पास ही ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करता है, वानप्रस्थ और संन्यासीका भी मूल गृहस्थ ही है। इस प्रकार चारों आश्रमोंका गृहस्थमें अन्तर्भाव है और ब्रह्मविद्याका अधिकार सभी आश्रमोंमें है, यह भी श्रुतिका अभिप्राय है, इसलिये वहाँ उस प्रकरणका गृहस्थके वर्णनके साथ-साथ उपसंहार किया गया है तथा पूर्व प्रकरणमें जो संन्यास-आश्रमका संकेत है, वह साधनोंकी सुगमताको लक्ष्य करके कहा गया है; क्योंकि किसी भी आश्रममें स्थित साधकको ब्रह्मज्ञानसम्पादनके लिये पुत्रैषणा आदि सभी प्रकारकी कामनाओं तथा रागद्वेषादि विकारोंका सर्वथा नाश करके मननशील तो होना ही पड़ेगा। दूसरे आश्रमोंमें विघ्नोंकी अधिकता है और संन्यास-आश्रममें स्वभावसे ही उनका अभाव है। इस सुगमताको दृष्टिमें रखकर वैसा कहा गया है, न कि अन्य आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याके अधिकारका निषेध करनेके लिये। सम्बन्ध - प्रकारान्तरसे पुनः सभी आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार सिद्ध किया जाता है— मौनवदितरेषामप्युपदेशात् ॥ ३।४।४९ ॥ इतरेषाम् = अन्य आश्रमवालोंके लिये; अपि = भी; मौनवत् = मनन- शीलताकी भाँति; उपदेशात् = (विद्योपयोगी सभी साधनोंका) उपदेश होनेके कारण (सभी आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार सिद्ध होता है।) व्याख्या - जिस प्रकार पूर्व प्रकरणमें मननशीलता (मौन)-रूप साधनका सबके लिये विधान बताया गया है, इसी प्रकार श्रुतिमें अन्य आश्रमवालोंके लिये भी विद्योपयोगी सभी साधनोंका उपदेश दिया गया है। जैसे—'इस प्रकार ब्रह्मवेत्ताकी महिमाको जाननेवाला शान्त (मनको वशमें करनेवाला मननशील), दान्त (इन्द्रियसमुदायको वशमें करनेवाला), उपरत (भोगोंसे