भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 410

सूत्र ५० ] अध्याय ३ ४०७ सम्बन्धरहित), तितिक्षु (सुख-दुःखसे विचलित न होनेवाला) और समाहित (ध्यानस्थ) होकर अपने ही भीतर उस सबके आत्मस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार करता है।' (बृह० उ० ४।४।२३) ऐसी ही बात दूसरे प्रकरणोंमें भी कही है। इससे यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्याका अधिकार सभी आश्रमोंमें है। सम्बन्ध - सैंतालीसवें सूत्रके प्रकरणमें जो बाल्यभावसे स्थित होनेकी बात कही गयी थी, उसमें बालकके कौन-से भावोंका ग्रहण है, यह स्पष्ट करनेके लिये कहते हैं- अनाविष्कुर्वन्नन्वयात् ॥ ३।४।५० ॥ अनाविष्कुर्वन् = अपने गुणोंको प्रकट न करता हुआ बालककी भाँति दम्भ और अभिमानसे रहित होवे; अन्वयात् = क्योंकि ऐसे भावोंका ही ब्रह्म- विद्यासे सम्बन्ध है। व्याख्या - अपने गुणोंको प्रकट न करते हुए बालकके भावको स्वीकार करनेके लिये श्रुतिका कहना है; अतः जैसे बालकमें मान, दम्भ तथा राग- द्वेष आदि विकारोंका प्रादुर्भाव नहीं तथा गुणोंका अभिमान या उनको प्रकट करनेका भाव नहीं है उसी प्रकार उन विकारोंसे रहित होना ही यहाँ बाल्यभाव है। अपवित्र-भक्षण, आचारहीनता, अशौच और स्वेच्छाचारिता आदि निषिद्ध भावोंको ग्रहण करना यहाँ अभीष्ट नहीं है; क्योंकि विद्याके सहकारी साधन- रूपसे श्रुतिमें बाल्यभावका उल्लेख हुआ है। अतः उसके उपयोगी भाव ही लिये जा सकते हैं, विरोधी भाव नहीं। इससे श्रुतिका यही भाव मालूम होता है कि ब्रह्मविद्याका साधक बालककी भाँति अपने गुणोंका प्रदर्शन न करता हुआ दम्भ, अभिमान तथा राग-द्वेष आदिसे रहित होकर विचरे। सम्बन्ध - यहाँतक यह निश्चय किया गया कि सभी आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार है। अब यह जिज्ञासा होती है कि शास्त्रोंमें जो ब्रह्मविद्याका फल जन्म-मृत्यु आदि दुःखोंसे छूटना और परमात्माको प्राप्त हो जाना बताया गया है, वह इसी जन्ममें प्राप्त हो जाता है या जन्मान्तरमें ? इसपर कहते हैं-