वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् ॥ ३।४।५१ ॥ अप्रस्तुतप्रतिबन्धे=किसी प्रकारका प्रतिबन्ध उपस्थित न होनेपर; ऐहिकम् = इसी जन्ममें वह फल प्राप्त हो सकता है; अपि= (प्रतिबन्ध होनेपर) जन्मान्तरमें भी हो सकता है; तद्दर्शनात् = क्योंकि यही बात श्रुतियों और स्मृतियोंमें देखी जाती है। व्याख्या - श्रुतिमें कहा गया है कि गर्भमें स्थित वामदेव ऋषिको ब्रह्मभावकी प्राप्ति हो गयी थी। (ऐ० उ० २।५) भगवद्गीतामें कहा है कि 'न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥' 'कल्याणमय कर्म अर्थात् परमात्माकी प्राप्तिके लिये साधन करनेवालेकी कभी दुर्गति नहीं होती' (६।४०) । 'किंतु वह दूसरे जन्ममें पूर्वजन्म-सम्बन्धी शरीरद्वारा प्राप्त की हुई बुद्धिसे युक्त हो जाता है और पुनः परमात्माकी प्राप्तिके साधनमें लग जाता है। * (गीता ६। ४३) इस प्रकार श्रुतियों और स्मृतियोंके प्रमाणोंको देखनेसे यही सिद्ध होता है कि यदि किसी प्रकारका कोई प्रतिबन्ध उपस्थित नहीं होता, तब तो इसी जन्ममें उसको मुक्तिरूप फलकी प्राप्ति हो जाती है और यदि कोई विघ्न पड़ जाता है तो जन्मान्तरमें वह फल मिलता है। तथापि यह निश्चय है कि किया हुआ अभ्यास व्यर्थ नहीं जाता। सम्बन्ध - उपर्युक्त ब्रह्मविद्याका मुक्तिरूप फल किसी प्रकारका प्रतिबन्ध न रहनेके कारण जिस साधकको इसी जन्ममें मिलता है, उसे यहाँ मृत्युलोकमें ही मिल जाता है या लोकान्तरमें जाकर मिलता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- एवं मुक्तिफलानियमस्तदवस्थावधृतेस्त- दवस्थावधृतेः ॥ ३।४।५२ ॥ एवम् = इसी तरह; मुक्तिफलानियमः = किसी एक लोकमें ही मुक्तिरूप फल प्राप्त होनेका नियम नहीं है; तदवस्थावधृतेः = क्योंकि
- तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥