भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 412, कुल 486 में से

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पृष्ठ 412

सूत्र ५२ ] अध्याय ३ ४०९ उसकी अवस्था निश्चित की गयी है; तदवस्थावधृतेः=उसकी अवस्था निश्चित की गयी है। (इस कथनकी पुनरावृत्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है)। व्याख्या—ब्रह्मविद्यासे मिलनेवाले मुक्तिरूप फलके विषयमें जिस प्रकार यह नियम नहीं है कि 'वह इसी जन्ममें मिलता है या जन्मान्तरमें।' उसी प्रकार उसके विषयमें यह भी नियम नहीं है कि वह इस लोकमें मिलता है या ब्रह्मलोकमें? क्योंकि 'जब इसके हृदयमें स्थित समस्त कामनाओंका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब वह साधक अमृत हो जाता है और यहीं ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।' (क० उ० २।३।१४)* इत्यादि वचनोंद्वारा श्रुतिमें मुक्तावस्थाका स्वरूप निश्चित किया गया है। अतः जिसको वह स्थिति शरीरके रहते-रहते प्राप्त हो जाती है, वह तो यहीं परमात्माको प्राप्त हो जाता है और जिसकी वैसी अवस्था यहाँ नहीं होती, वह ब्रह्मलोकमें जाकर परमात्माको प्राप्त हो जाता है। चौथा पाद सम्पूर्ण श्रीवेदव्यास रचित वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र)-का तीसरा अध्याय पूरा हुआ।

  • यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥