वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र २-३ ] अध्याय २ १७१
सूत्र २-३ ] अध्याय २ १७१ बुद्धिमान् वैज्ञानिक तथा चतुर शिल्पी मनसे भी नहीं कर पाते, उस विचित्र रचना-चातुर्ययुक्त अद्भुत जगत्की सृष्टि भला जड प्रकृति कैसे कर सकती है ? मिट्टी, पत्थर आदि जड पदार्थोंमें इस प्रकार अपने-आप रचना करनेकी कोई शक्ति नहीं देखी जाती है। अतः किसी भी युक्तिसे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि जड प्रधान इस जगत्का कारण है। सम्बन्ध- अब दूसरी युक्तिसे प्रधानकारणवादका खण्डन करते हैं— प्रवृत्तेश्च ॥ २।२।२॥ प्रवृत्तेः=जगत्की रचनाके लिये जड प्रकृतिका प्रवृत्त होना; च=भी सिद्ध नहीं होता (इसलिये प्रधान इस जगत्का कारण नहीं है)। व्याख्या - जगत्की रचना करना तो दूर रहा, रचनादि कार्यके लिये जड प्रकृतिमें प्रवृत्तिका होना भी असम्भव जान पड़ता है; क्योंकि साम्यावस्थामें स्थित सत्त्व, रज और तम- इन तीनों गुणोंका नाम प्रधान या प्रकृति है*, उस जड प्रधानका बिना किसी चेतनकी सहायताके सृष्टिकार्य प्रारम्भ करनेके लिये प्रवृत्त होना कदापि सम्भव नहीं है। कोई भी जड पदार्थ चेतनका सहयोग प्राप्त हुए बिना कभी अपने-आप किसी कार्यमें प्रवृत्त होता हो, ऐसा नहीं देखा जाता है। सम्बन्ध- अब पूर्वपक्षीके द्वारा दिये जानेवाले जल आदिके दृष्टान्तमें भी चेतनका सहयोग दिखलाकर उपर्युक्त बातकी ही सिद्धि करते हैं— पयोऽम्बुवच्चेत्तत्रापि ॥ २।२।३॥ चेत्=यदि कहो; पयोऽम्बुवत्=दूध और जलकी भाँति (जड प्रधानका सृष्टि-रचनाके लिये प्रवृत्त होना सम्भव है); तत्रापि=तो उसमें भी चेतनका सहयोग है (अतः केवल जडमें प्रवृत्ति न होनेसे उसके द्वारा जगत्की रचना असम्भव है)।
- सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः। (सां० सू० १। ६१)
१७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—यदि कहो कि 'जैसे अचेतन दूध बछड़ेकी पुष्टिके लिये अपने-आप गायके थनमें उतर आता है* तथा अचेतन जल लोगोंके उपकारके लिये अपने-आप नदी-निर्झर आदिके रूपमें बहता रहता है, उसी प्रकार जड प्रधान भी जगत्की सृष्टिके कार्यमें बिना चेतनके ही स्वयं प्रवृत्त हो सकता है' तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि जिस प्रकार रथ आदि अचेतन वस्तुएँ बिना चेतनका सहयोग पाये संचरण आदि कार्योंमें प्रवृत्त नहीं होतीं, उसी प्रकार थनमें दूध उतरने और नदी-निर्झर आदिके बहनेमें भी अव्यक्त चेतनकी ही प्रेरणा काम करती है, यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है। शास्त्र भी इस अनुमानका समर्थक है—'योऽप्सु तिष्ठन्... अपोऽन्तरो यमयति।' (बृह० उ० ३।७।४) अर्थात् 'जो जलमें रहनेवाला है और उसके भीतर रहकर उसका नियमन करता है।' 'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते' (बृह० उ० ३।८।९) अर्थात् 'हे गार्गि! इस अक्षर (परमात्मा)-के ही प्रशासनमें पूर्ववाहिनी तथा अन्य नदियाँ बहती हैं।' इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे सिद्ध होता है कि समस्त जड वस्तुओंका संचालक चेतन है। गायके थनमें जो दूध उतरता है, उसमें भी चेतन गौका वात्सल्य और चेतन बछड़ेका चूसना कारण है। इसी प्रकार जल नीची भूमिकी ओर ही स्वभावतः बहता है। लोगोंके उपकारके लिये वह स्वयं उठकर ऊँची भूमिपर नहीं चला जाता। परंतु चेतन पुरुष अपने प्रयत्नसे उस जलके प्रवाहको जिधर चाहें मोड़ सकते हैं। इस प्रकार प्रत्येक प्रवृत्तिमें चेतनकी अपेक्षा सर्वत्र देखी जाती है; इसलिये किसी भी युक्तिसे जड प्रधानका स्वतः जगत्की रचनामें प्रवृत्त होना सिद्ध नहीं होता। सम्बन्ध—अब प्रकारान्तरसे प्रधानकारणवादका खण्डन करते हैं—
- अचेतनत्वेऽपि क्षीरवच्चेष्टितं प्रधानस्य। (सां० सू० ३।१७०)
सूत्र ४-५ ] अध्याय २ १७३ व्यतिरेकानवस्थितेश्च अनपेक्षत्वात् ॥ २।२।४॥ च=इसके सिवा; व्यतिरेकानवस्थितेः=सांख्यमतमें प्रधानके सिवा, दूसरा कोई उसकी प्रवृत्ति या निवृत्तिका नियामक नहीं माना गया है, इसलिये; (और) अनपेक्षत्वात्=प्रधानको किसीकी अपेक्षा नहीं है, (इसलिये भी प्रधान कभी सृष्टिरूपमें परिणत होता और कभी नहीं होता है, यह बात सम्भव नहीं जान पड़ती।) व्याख्या—सांख्यमतावलम्बियोंकी मान्यताके अनुसार त्रिगुणात्मक प्रधानके सिवा, दूसरा कोई कारण, प्रेरक या प्रवर्तक नहीं माना गया है। पुरुष उदासीन है, वह न तो प्रधानका प्रवर्तक है, न निवर्तक। प्रधान स्वयं भी अनपेक्ष है, वह किसी दूसरेकी अपेक्षा नहीं रखता। ऐसी स्थितिमें जड प्रधान कभी तो महत्तत्त्व आदि विकारोंके रूपमें परिणत होता है और कभी नहीं होता है, यह कैसे युक्तिसंगत होगा। यदि जगत्की उत्पत्ति करना उसका स्वभाव अथवा धर्म है, तब तो प्रलयके कार्यमें उसकी प्रवृत्ति नहीं होगी ? और यदि स्वभाव नहीं है तो उत्पत्तिके लिये प्रवृत्ति नहीं होगी। इस प्रकार कोई भी व्यवस्था न हो सकनेके कारण प्रधान जगत्का कारण नहीं हो सकता। सम्बन्ध—तृणसे दूध बननेकी भाँति प्रकृतिसे स्वभावतः जगत्की उत्पत्ति होती है, इस कथनकी असंगति दिखाते हुए कहते हैं— अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् ॥ २।२।५॥ अन्यत्र=दूसरे स्थानमें; अभावात्=वैसे परिणामका अभाव है, इसलिये; च=भी; तृणादिवत्=तृण आदिकी भाँति; (प्रधानका जगत्के रूपमें परिणत होना) न=नहीं सिद्ध होता। व्याख्या—जो घास ब्यायी हुई गौद्वारा खायी जाती है, उसीसे दूध बनता है। वही घास यदि बैल या घोड़ेको खिला दी जाय या अन्यत्र रख दी जाय तो उससे दूध नहीं बनता। इस प्रकार अन्य स्थानोंमें घास आदिका वैसा परिणाम दृष्टिगोचर नहीं होता; इससे यह सिद्ध होता है कि विशिष्ट चेतनके
१७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
१७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सहयोग बिना जड प्रकृति जगत्-रूपमें परिणत नहीं हो सकती। जैसे तृण आदिका दूधके रूपमें परिणत होना तभी सम्भव होता है, जब उसे ब्यायी हुई चेतन गौके उदरमें स्थित होनेका अवसर मिलता है। सम्बन्ध—प्रधानमें जगत्-रचनाकी स्वाभाविक प्रवृत्ति मानना व्यर्थ है, यह बतानेके लिये कहते हैं— अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् ॥ २ । २ । ६ ॥ अभ्युपगमे=(अनुमानसे प्रधानमें सृष्टिरचनाकी स्वाभाविक प्रवृत्ति) स्वीकार कर लेनेपर; अपि=भी; अर्थाभावात्=कोई प्रयोजन न होनेके कारण (यह मान्यता व्यर्थ ही होगी)। व्याख्या—यद्यपि चेतनकी प्रेरणाके बिना जड प्रकृतिका सृष्टि-रचना आदि कार्यमें प्रवृत्त होना नहीं बन सकता, तथापि यदि यह मान लिया जाय कि स्वभावसे ही प्रधान जगत्की उत्पत्तिके कार्यमें प्रवृत्त हो सकता है तो इसके लिये कोई प्रयोजन नहीं दिखायी देता; क्योंकि सांख्यमतमें माना गया है कि प्रधानकी प्रवृत्ति पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये ही होती है। * परंतु उनकी मान्यताके अनुसार पुरुष असंग, चैतन्यमात्र, निष्क्रिय, निर्विकार, उदासीन, निर्मल तथा नित्यशुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव है; उसके लिये प्रकृतिदर्शनरूप भोग तथा उससे विमुक्त होनारूप अपवर्ग दोनोंकी ही आवश्यकता नहीं है। इसलिये उनका माना हुआ प्रयोजन व्यर्थ ही है। अतः प्रधानकी लोकरचनाके कार्यमें स्वाभाविक प्रवृत्ति मानना निरर्थक है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे सांख्यमतकी मान्यतामें दोष दिखाते हैं— पुरुषाश्मवदिति चेत्तथापि ॥ २ । २ । ७ ॥ चेत् इति=यदि ऐसा कहो कि; पुरुषाश्मवत्= अंधे और पंगु पुरुषों तथा लोह और चुम्बकके संयोगकी भाँति (प्रकृति-पुरुषकी समीपता ही प्रकृतिको
- पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य। (सां० का० २१)
सूत्र ७ ] अध्याय २ १७५
सूत्र ७ ] अध्याय २ १७५ सृष्टिरचनामें प्रवृत्त कर देती है); तथापि=तो ऐसा माननेपर भी (सांख्य- सिद्धान्तकी सिद्धि नहीं होती)। व्याख्या—'जैसे पंगु और अंधे परस्पर मिल जायँ और अंधेके कंधेपर बैठकर पंगु उसे राह बताया करे तो दोनों गन्तव्य स्थानपर पहुँच जाते हैं तथा लोहे और चुम्बकका संयोग होनेपर लोहेमें क्रियाशक्ति आ जाती है, उसी प्रकार पुरुष और प्रकृतिका संयोग ही सृष्टिरचनाका कारण है।* पुरुषकी समीपतामात्रसे जड प्रकृति जगत्की उत्पत्ति आदिके कार्यमें प्रवृत्त हो जाती है।' सांख्यवादियोंकी कही हुई यह बात मान ली जाय तो भी इससे सांख्य-सिद्धान्तकी पुष्टि नहीं होती, क्योंकि पंगु और अंधे दोनों चेतन हैं, एक गमनशक्तिसे रहित होनेपर भी बौद्धिक आदि अन्य शक्तियोंसे सम्पन्न है; अंधा पुरुष देखनेकी शक्तिसे हीन होनेपर भी गमन एवं बुद्धि आदिकी शक्तिसे युक्त है। एक प्रेरणा देता है तो दूसरा उसे समझकर उसके अनुसार चलता है; अतः वहाँ भी चेतनका सहयोग स्पष्ट ही है। इसी प्रकार चुम्बक और लोहेको एक-दूसरेके समीप लानेके लिये एक तीसरे चेतन पुरुषकी आवश्यकता होती है। चेतनके सहयोग बिना न तो लोहा चुम्बकके समीप जायगा और न उसमें क्रियाशक्ति उत्पन्न होगी। समीपता प्राप्त होनेपर भी दोनों एक-दूसरेसे सट जायँगे, लोहेमें किसी प्रकारकी आवश्यक क्रियाका संचार नहीं होगा, अतः ये दोनों दृष्टान्त इसी बातकी पुष्टि करते हैं कि चेतनकी प्रेरणा होनेसे ही जड प्रधान सृष्टि-कार्यमें प्रवृत्त हो सकता है; अन्यथा नहीं; परंतु सांख्यमतमें तो पुरुष असंग और उदासीन माना गया है, अतः वह प्रेरक हो नहीं सकता। इसलिये केवल जड प्रकृतिके द्वारा जगत्की उत्पत्ति किसी प्रकार भी सिद्ध नहीं हो सकती। सम्बन्ध— अब प्रधानकारणवादके विरोधमें दूसरी युक्ति देते हैं—
- पङ्गवन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः ॥ (सां० कारिका २१)
१७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
१७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ अङ्गित्वानुपपत्तेश्च ॥ २ । २ । ८ ॥ अङ्गित्वानुपपत्तेः = अंगांगिभाव (सत्त्वादि गुणोंके उत्कर्ष और अपकर्ष)- की सिद्धि न होनेके कारण; च = भी (केवल प्रधान इस जगत्का कारण नहीं माना जा सकता)। व्याख्या—पहले यह बताया गया है कि सांख्यमतमें तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाका नाम 'प्रधान' है। यदि गुणोंकी यह साम्यावस्था स्वाभाविक मानी जाय, तब तो कभी भी भंग न होगी, अतएव गुणोंमें विषमता न होनेके कारण अंगांगिभावकी सिद्धि न हो सकेगी; क्योंकि उन गुणोंमें ह्रास और वृद्धि होनेपर ही बढ़े हुए गुणको अंगी और घटे हुए गुणको अंग माना जाता है। यदि उन गुणोंकी विषमता (ह्रास-वृद्धि)-को ही स्वाभाविक माना जाय तब तो सदा जगत्की सृष्टिका ही क्रम चलता रहेगा, प्रलय कभी होगा ही नहीं। यदि पुरुषकी प्रेरणासे प्रकृतिके गुणोंमें क्षोभ होना मान लें तब तो पुरुषको असंग और निष्क्रिय मानना नहीं बन सकेगा। यदि परमेश्वरको प्रेरक माना जाय तब तो यह ब्रह्मकारणवादको ही स्वीकार करना होगा। इस प्रकार सांख्यमतके अनुसार गुणोंका अंगांगिभाव सिद्ध न होनेके कारण जड प्रधानको जगत्का कारण मानना असंगत है। सम्बन्ध—यदि अन्य प्रकारसे गुणोंकी साम्यावस्था भंग होकर प्रकृतिके द्वारा जगत्की उत्पत्ति होती है, ऐसा मान लिया जाय तो क्या हानि है? इसपर कहते हैं— अन्यथानुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात् ॥ २ । २ । ९ ॥ अन्यथा = दूसरे प्रकारसे; अनुमितौ = साम्यावस्था भंग होनेका अनुमान कर लेनेपर; च = भी; ज्ञशक्तिवियोगात् = प्रधानमें ज्ञानशक्ति न होनेके कारण (गृह, घट, पट आदिकी भाँति बुद्धिपूर्वक रची जानेवाली वस्तुओंकी उत्पत्ति उसके द्वारा नहीं हो सकती)। व्याख्या—यदि गुणोंकी साम्यावस्थाका भंग होना काल आदि अन्य निमित्तोंसे मान लिया जाय तो भी प्रधानमें ज्ञानशक्तिका अभाव तो है ही।
सूत्र १० ] अध्याय २ १७७ इसलिये उसके द्वारा बुद्धिपूर्वक कोई रचना नहीं हो सकती। जैसे गृह, वस्त्र, घट आदिका निर्माण कोई समझदार चेतन कर्ता ही कर सकता है, उसी प्रकार अनन्तकोटि ब्रह्माण्डके अन्तर्गत असंख्य जीवोंके छोटे- बड़े विविध शरीर एवं अन्न आदिकी बुद्धिपूर्वक होनेवाली सृष्टि जड प्रकृतिके द्वारा असम्भव है। ऐसी रचना तो सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सनातन परमात्मा ही कर सकता है; अतः जड प्रकृतिको जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—अब सांख्यदर्शनकी असमीचीनता बताते हैं— विप्रतिषेधाच्चासमंजसम् ॥ २ । २ । १० ॥ विप्रतिषेधात् = परस्पर विरोधी बातोंका वर्णन करनेसे; च = भी; असमंजसम् = सांख्यदर्शन समीचीन नहीं है। व्याख्या—सांख्यदर्शनमें बहुत-सी परस्पर-विरुद्ध बातोंका वर्णन पाया जाता है। जैसे पुरुषको असंग¹ और निष्क्रिय² मानना, फिर उसीको प्रकृतिका द्रष्टा³ और भोक्ता⁴ बताना, प्रकृतिके साथ उसका संयोग⁵ कहना, प्रकृतिको पुरुषके लिये भोग और मोक्ष⁶ प्रदान करनेवाली बताना तथा प्रकृति और पुरुषके नित्य पार्थक्यके ज्ञानसे दुःखका अभाव ही मोक्ष⁷ है, ऐसा मुक्तिका स्वरूप मानना—इत्यादि। इस कारण भी सांख्यदर्शन समीचीन (निर्दोष) नहीं जान पड़ता है। सम्बन्ध—उपर्युक्त दस सूत्रोंमें सांख्यशास्त्रकी समीक्षा की गयी। अब वैशेषिकोंके १-असंगोऽयं पुरुष इति। (सां० सू० १। १५) २-निष्क्रियस्य तदसम्भवात्। (सां० सू० १। ४९) ३-द्रष्टृत्वादिरात्मनः करणत्वमिन्द्रियाणाम्। (सां० सू० २। २९) ४-भोक्तृभावात्। (सां० सू० १। १४३) ५-न नित्यशुद्धमुक्तस्वभावस्य तद्योगस्तद्योगादृते। (सां० सू० १। १९) ६-पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य। (सांख्यकारिका २१) ७-विवेकान्निःशेषदुःखनिवृत्तौ कृतकृत्यता नेतरान्नेतरात्। (सां० सू० ३। ८४)
हुए दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं—
१७८ वेदान्त-दर्शन [पाद २ परमाणुवादका खण्डन करनेके लिये उनकी मान्यताको असंगत बताते हुए दूसरा प्रकरण आरम्भ करते हैं— महद्दीर्घवद्वा ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् ॥ २।२।११॥ ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् = ह्रस्व (द्व्यणुक) तथा परिमण्डल (परमाणु)- से; महद्दीर्घवत् = महत् एवं दीर्घ (त्र्यणुक)-की उत्पत्ति बतानेकी भाँति; वा= ही (वैशेषिकोंके द्वारा प्रतिपादित सभी बातें असमंजस—असंगत) हैं। व्याख्या—परमाणुकारणवादी वैशेषिकोंकी मानी हुई प्रक्रिया इस प्रकार है—एक द्रव्य सजातीय दूसरे द्रव्यको और एक गुण सजातीय दूसरे गुणको उत्पन्न करता है। समवायी, असमवायी और निमित्त—तीनों कारणोंसे कार्यकी उत्पत्ति होती है। जैसे वस्त्रकी उत्पत्तिमें तन्तु (सूत) तो समवायिकारण है, तन्तुओंका परस्पर संयोग असमवायिकारण है और तुरी, वेमा तथा वस्त्र बुननेवाला कारीगर आदि निमित्तकारण हैं। परमाणुके चार भेद हैं—पार्थिव परमाणु, जलीय परमाणु, तैजस परमाणु तथा वायवीय परमाणु। ये परमाणु नित्य, निरवयव तथा रूपादि गुणोंसे युक्त हैं। इनका जो परिमाण (माप) है, उसे पारिमाण्डल्य कहते हैं। प्रलयकालमें ये परमाणु कोई भी कार्य आरम्भ न करके यों ही स्थित रहते हैं। सृष्टिकालमें कार्यसिद्धिके लिये परमाणु तो समवायिकारण बनते हैं, उनका एक-दूसरेसे संयोग असमवायिकारण होता है, अदृष्ट या ईश्वरकी इच्छा आदि उसमें निमित्तकारण बनते हैं। उस समय भगवान्की इच्छासे पहला कर्म वायवीय परमाणुओंमें प्रकट होता है, फिर एक दूसरेका संयोग होता है। दो परमाणु संयुक्त होकर एक द्व्यणुकरूप कार्यको उत्पन्न करते हैं। तीन द्व्यणुकोंसे त्र्यणुक उत्पन्न होता है। चार त्र्यणुकोंसे चतुरणुककी उत्पत्ति होती है। इस क्रमसे महान् वायुतत्त्व प्रकट होता है और वह आकाशमें वेगसे बहने लगता है। इसी प्रकार तैजस परमाणुओंसे अग्निकी उत्पत्ति होती है और वह प्रज्वलित होने लगता है। जलीय परमाणुओंसे जलका महासागर प्रकट होकर उत्ताल तरंगोंसे युक्त दिखायी देता है तथा इसी
सूत्र १२ ] अध्याय २ १७९
सूत्र १२ ] अध्याय २ १७९ क्रमसे पार्थिव परमाणुओँसे यह बड़ी भारी पृथिवी उत्पन्न होती है। मिट्टी और प्रस्तर आदि इसका स्वरूप है। यह अचल भावसे स्थित होती है। कारणके गुणोंसे ही कार्यके गुण उत्पन्न होते हैं। जैसे तन्तुओंके शुक्ल, नील, पीत आदि गुण ही वस्त्रमें वैसे गुण प्रकट करते हैं, इसी प्रकार परमाणुगत शुक्ल आदि गुणोंसे ही द्व्यणुकगत शुक्ल आदि गुण प्रकट होते हैं। द्व्यणुकके आरम्भक (उत्पादक) जो दो परमाणु हैं, उनकी वह द्वित्व संख्या द्व्यणुकमें अणुत्व और ह्रस्वत्व—इन दो परिमाणान्तरोंका आरम्भ (आविर्भाव) करती है। परंतु विभिन्न परमाणुमें जो पृथक्-पृथक् पारिमाण्डल्य नामक परिमाण होता है, वह द्व्यणुकमें दूसरे पारिमाण्डल्यको नहीं प्रकट करता है, क्योंकि वैसा करनेपर वह कार्य पहलेसे भी अत्यन्त सूक्ष्म होने लगेगा। इसी प्रकार संहारकालमें भी परमेश्वरकी इच्छासे परमाणुओमें कर्म प्रारम्भ होता है, इससे उनके पारस्परिक संयोगका नाश होता है, फिर द्व्यणुक आदिका नाश होते-होते पृथिवी आदिका भी नाश हो जाता है। वैशेषिकोंकी इस प्रक्रियाका सूत्रकार निराकरण करते हुए कहते हैं कि यदि कारणके ही गुण कार्यमें प्रकट होते हैं, तब तो परमाणुका गुण जो पारिमाण्डल्य (अत्यन्त सूक्ष्मता) है वही द्व्यणुकमें भी प्रकट होना उचित है; पर ऐसा नहीं होता। उनके ही कथनानुसार दो परमाणुओँसे ह्रस्वगुणविशिष्ट द्व्यणुककी उत्पत्ति होती है और ह्रस्व द्व्यणुकोंसे महत् दीर्घ परिमाणवाले त्र्यणुककी उत्पत्ति होती है। इस प्रकार जैसे वैशेषिकोंकी ऊपर बतायी हुई मान्यता असंगत है, उसी प्रकार उनके द्वारा कही जानेवाली अन्य बातें भी असंगत हैं। सम्बन्ध—इसी बातको स्पष्ट करते हैं— उभयथापि न कर्मातस्तदभावः ॥ २ । २ । १२ ॥ उभयथा=दोनों प्रकारसे; अपि=ही; कर्म=परमाणुओमें कर्म होना; न=नहीं सिद्ध होता; अतः=इसलिये; तदभावः=परमाणुओंके संयोगपूर्वक द्व्यणुक आदिकी उत्पत्तिके क्रमसे जगत्का जन्म आदि होना सम्भव नहीं है।
१८० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
१८० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
व्याख्या— परमाणुवादियोंका कहना है कि 'सृष्टिके पूर्व परमाणु निश्चल रहते हैं, उनमें कर्म उत्पन्न होकर परमाणुओंका संयोग होता है और उससे जगत्की उत्पत्ति होती है।' इसपर सूत्रकार कहते हैं कि यदि उन परमाणुओंमें कर्मका संचार बिना किसी निमित्तके अपने-आप हो जाता है, ऐसा मानें तो यह असम्भव है; क्योंकि उनके मतानुसार प्रलयकालमें परमाणु निश्चल माने गये हैं। यदि ऐसा मानें कि जीवोंके अदृष्ट कर्मसंस्कारोंसे परमाणुओंमें कर्मका संचार हो जाता है तो यह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि जीवोंका अदृष्ट तो उन्हींमें रहता है न कि परमाणुओंमें; अतः वह उनमें कर्मका संचार नहीं कर सकता। उक्त दोनों प्रकारसे ही परमाणुओंमें कर्म होना सिद्ध नहीं होता, इसलिये परमाणुओंके संयोगसे जगत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसके सिवा, अदृष्ट अचेतन है। कोई भी अचेतन वस्तु किसी चेतनका सहयोग प्राप्त किये बिना न तो स्वयं कर्म कर सकती है और न दूसरेसे ही करा सकती है। यदि कहें, जीवके शुभाशुभ कर्मसे ही अदृष्ट बनता है, अतः जीवात्माकी चेतनता उसके साथ है तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि सृष्टिके पहले जीवात्माकी चेतनता जाग्रत् नहीं है, अतः वह अचेतनके ही तुल्य है। इसके सिवा, जीवात्मामें ही अदृष्टकी स्थिति स्वीकार करनेपर वह परमाणुओंमें क्रियाशीलता उत्पन्न करनेमें निमित्त नहीं बन सकता; क्योंकि परमाणुओंसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार किसी नियत निमित्तके न होनेसे परमाणुओंमें पहला कर्म नहीं उत्पन्न हो सकता। उस कर्म या क्रियाशीलताके बिना उनका परस्पर संयोग नहीं हो सकेगा। संयोग न होनेसे द्व्यणुक आदिकी उत्पत्तिके क्रमसे जगत्की सृष्टि और प्रलय भी न हो सकेंगे। सम्बन्ध— परमाणु कारणवादके खण्डनके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— समवायाभ्युपगमाच्च साम्यादनवस्थितेः ॥ २।२।१३॥ समवायाभ्युपगमात्=परमाणुवादमें समवाय-सम्बन्धको स्वीकार किया गया है, इसलिये; च=भी (परमाणुकारणवाद सिद्ध नहीं हो सकता); साम्यात्=क्योंकि कारण और कार्यकी भाँति समवाय और समवायीमें भी
सूत्र १४ ] अध्याय २ १८१
सूत्र १४ ] अध्याय २ १८१ भिन्नताकी समानता है, इसलिये; अनवस्थितेः=उनमें अनवस्थादोषकी प्राप्ति हो जानेपर परमाणुओंके संयोगसे जगत्की उत्पत्ति नहीं हो सकेगी। व्याख्या—वैशेषिकोंकी मान्यताके अनुसार युतसिद्ध अर्थात् अलग- अलग रह सकनेवाली वस्तुओंमें परस्पर संयोग-सम्बन्ध होता है और अयुत- सिद्ध अर्थात् अलग-अलग न रहनेवाली वस्तुओंमें समवाय-सम्बन्ध होता है। रज्जु (रस्सी) और घट—ये युतसिद्ध वस्तुएँ हैं, अतः इनमें संयोग- सम्बन्ध ही स्थापित हो सकता है। तन्तु और वस्त्र—ये अयुतसिद्ध वस्तुएँ हैं, अतः इनमें सदा समवाय-सम्बन्ध रहता है। यद्यपि कारणसे कार्य अत्यन्त भिन्न है तो भी उनके मतमें समवायि कारण और कार्यका पारस्परिक सम्बन्ध 'समवाय' कहा गया है। इसके अनुसार दो अणुओंसे उत्पन्न होनेवाला 'द्व्यणुक' नामक कार्य उन अणुओंसे भिन्न होकर भी समवाय-सम्बन्धके द्वारा उनसे सम्बद्ध होता है, ऐसा मान लेनेपर, जैसे द्व्यणुक उन अणुओंसे भिन्न है, उसी प्रकार 'समवाय' भी समवायीसे भिन्न है। भेदकी दृष्टिसे दोनोंमें समानता है। अतः जैसे द्व्यणुक समवाय-सम्बन्धके द्वारा उन दो अणुओंसे सम्बद्ध माना गया है, उसी प्रकार समवाय भी अपने समवायीके साथ नूतन समवाय-सम्बन्धके द्वारा सम्बद्ध माना जा सकता है। इस प्रकार एकके बाद दूसरे समवाय-सम्बन्धकी कल्पना होती रहेगी और इस परम्पराका कहीं भी अन्त न होनेके कारण अनवस्था दोष प्राप्त होगा। अतः समवाय- सम्बन्ध सिद्ध न हो सकनेके कारण दो अणुओंसे द्व्यणुककी उत्पत्ति आदि क्रमसे जगत्की सृष्टि नहीं हो सकती। सम्बन्ध— यदि परमाणुओंमें सृष्टि और प्रलयके निमित्त क्रियाका होना स्वाभाविक मान लें तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— नित्यमेव च भावात् ॥ २।२।१४॥ च=इसके सिवा (परमाणुओंमें प्रवृत्ति या निवृत्तिका कर्म स्वाभाविक माननेपर); नित्यम्=सदा; एव=ही; भावात्=सृष्टि या प्रलयकी सत्ता बनी रहेगी, इसलिये (परमाणुकारणवाद असंगत है)।
१८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
१८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—परमाणुवादी परमाणुओंको नित्य मानते हैं, अतः उनका जैसा भी स्वभाव माना जाय, वह नित्य ही होगा। यदि ऐसा मानें कि उनमें प्रवृत्ति-मूलक कर्म स्वभावतः होता है, तब तो सदा ही सृष्टि होती रहेगी, कभी भी प्रलय नहीं होगा। यदि उनमें निवृत्ति-मूलक कर्मका होना स्वाभाविक मानें तब तो सदा संहार ही बना रहेगा, सृष्टि नहीं होगी। यदि दोनों प्रकारके कर्मोंको उनमें स्वाभाविक माना जाय तो यह असंगत जान पड़ता है; क्योंकि एक ही तत्त्वमें परस्परविरुद्ध दो स्वभाव नहीं रह सकते। यदि उनमें दोनों तरहके कर्मोंका न होना ही स्वाभाविक मान लिया जाय तब तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि कोई निमित्त प्राप्त होनेपर ही उनमें प्रवृत्ति एवं निवृत्ति-सम्बन्धी कर्म भी हो सकते हैं; परंतु उनके द्वारा माने हुए निमित्तसे सृष्टिका आरम्भ न होना पहले ही सिद्ध कर दिया गया है, इसलिये यह परमाणुकारणवाद सर्वथा अयुक्त है। सम्बन्ध—अब परमाणुओंकी नित्यतामें ही संदेह उपस्थित करते हुए परमाणुकारणवादकी व्यर्थता सिद्ध करते हैं— रूपादिमत्त्वाच्च विपर्ययो दर्शनात्॥ २। २। १५॥ च=तथा; रूपादिमत्त्वात्=परमाणुओंको रूप, रस आदि गुणोंवाला माना गया है, इसलिये; विपर्ययः =उनमें नित्यताके विपरीत अनित्यताका दोष उपस्थित होता है; दर्शनात्=क्योंकि ऐसा ही देखा जाता है। व्याख्या—वैशेषिक मतमें परमाणु नित्य होनेके साथ-साथ रूप, रस आदि गुणोंसे युक्त भी माने गये हैं। इससे उनमें नित्यताके विपरीत अनित्यताका दोष उपस्थित होता है; रूपादि गुणोंसे युक्त होनेपर वे नित्य नहीं माने जा सकते, क्योंकि रूप आदि गुणवाली जो घट आदि वस्तुएँ हैं, उनकी अनित्यता प्रत्यक्ष देखी जाती है। यदि उन परमाणुओंको रूप, रस आदि गुणोंसे रहित मानें तो उनके कार्यमें रूप आदि गुण नहीं होने चाहिये। इसके सिवा वैसा न माननेपर 'रूपादिमन्तो नित्याश्च'—रूपादि गुणोंसे युक्त और
सूत्र १६ ] अध्याय २ १८३ नित्य हैं, इस प्रतिज्ञाकी सिद्धि नहीं होती। इस प्रकार अनुपपत्तियोंसे भरा हुआ यह परमाणुवाद कदापि सिद्ध नहीं होता। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे परमाणुवादको सदोष सिद्ध करते हैं— उभयथा च दोषात्॥ २। २। १६॥ उभयथा=परमाणुओंको न्यूनाधिक गुणोंसे युक्त मानें या गुणरहित मानें, दोनों प्रकारसे; च=ही; दोषात्=दोष आता है, इसलिये (परमाणुवाद सिद्ध नहीं होता।) व्याख्या—पृथिवी आदि भूतोंमेंसे किसीमें अधिक और किसीमें कम गुण देखे जाते हैं, इससे उनके आरम्भक परमाणुओंमें भी न्यूनाधिक गुणोंकी स्थिति माननी होगी। ऐसी दशामें यदि उनको अधिक गुणोंसे युक्त माना जाय तब तो सभी कार्योंमें उतने ही गुण होने चाहिये; क्योंकि कारणके गुण कार्यमें समानजातीय गुणान्तर प्रकट करते हैं। उस दशामें जलमें भी गन्ध और तेजमें भी गन्ध एवं रस प्रकट होनेका दोष प्राप्त होगा। अधिक गुणवाली पृथिवीमें स्थूलता नामक गुण देखा जाता है, यही गुण कारणभूत परमाणुमें मानना पड़ेगा। यदि ऐसा मानें कि उनमें न्यूनतम अर्थात् एक-एक गुण ही हैं तब तो सभी स्थूल भूतोंमें एक-एक गुण ही प्रकट होना चाहिये। उस अवस्थामें तेजमें स्पर्श नहीं होगा, जलमें रूप और स्पर्श नहीं रहेंगे तथा पृथिवीमें रस, रूप एवं स्पर्शका अभाव होगा; क्योंकि उनके परमाणुओंमें एकसे अधिक गुणका अभाव है। यदि उनमें सर्वथा गुणोंका अभाव मान लें तो उनके कार्योंमें जो गुण प्रकट होते हैं, वे उन कारणोंके विपरीत होंगे। यदि कहें कि विभिन्न भूतोंके अनुसार उनके कारणोंमें कहीं अधिक, कहीं कम गुण स्वीकार करनेसे दोष नहीं आवेगा; तो ठीक नहीं है; क्योंकि जिन परमाणुओंमें अधिक गुण माने जायँगे, उनकी परमाणुता ही नहीं रह जायगी; अतः परमाणुवाद किसी भी युक्तिसे सिद्ध नहीं होता है। सम्बन्ध—अब परमाणुवादको अग्राह्य बताते हुए इस प्रकरणको समाप्त करते हैं—
१८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
१८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा ॥ २ । २ । १७ ॥ अपरिग्रहात् = परमाणुकारणवादको शिष्ट पुरुषोंने ग्रहण नहीं किया है, इसलिये; च = भी; अत्यन्तम् अनपेक्षा = इसकी अत्यन्त उपेक्षा करनी चाहिये। व्याख्या — पूर्वोक्त प्रधानकारणवादमें अंशतः सत्कार्यवादका निरूपण है। अतः उस सत्कार्यवादरूप अंशको मनु आदि शिष्ट पुरुषोंने ग्रहण किया है, परंतु इस परमाणुकारणवादको तो किसी भी श्रेष्ठ पुरुषने स्वीकार नहीं किया है, अतः यह सर्वथा उपेक्षणीय है। सम्बन्ध — ग्यारहवेंसे सत्रहवेंतक सात सूत्रोंमें परमाणुवादका खण्डन किया गया। अब क्षणिकवादका निराकरण करनेके लिये यह प्रकरण आरम्भ करते हैं— समुदाये उभयहेतुकेऽपि तदप्राप्तिः ॥ २ । २ । १८ ॥ उभयहेतुके = परमाणुहेतुक बाह्य समुदाय और स्कन्धहेतुक आभ्यन्तर समुदाय ऐसे दो प्रकारके; समुदाये = समुदायको स्वीकार कर लेनेपर; अपि = भी; तदप्राप्तिः = उस समुदायकी प्राप्ति (सिद्धि) नहीं होती है। व्याख्या — बौद्धमतके अनुयायी परस्पर किंचित् मतभेदको लेकर चार श्रेणियोंमें विभक्त हो गये हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—वैभाषिक, सौत्रान्तिक, योगाचार तथा माध्यमिक। इनमें वैभाषिक और सौत्रान्तिक ये दोनों बाह्य पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार करते हैं। दोनोंमें अन्तर इतना ही है कि वैभाषिक प्रत्यक्ष दीखनेवाले बाह्य पदार्थोंका अस्तित्व मानता है और सौत्रान्तिक विज्ञानसे अनुमित बाह्य पदार्थोंकी सत्ता स्वीकार करता है। वैभाषिकके मतमें घट आदि बाह्य पदार्थ प्रत्यक्ष प्रमाणके विषय हैं। सौत्रान्तिक घट आदिके रूपमें उत्पन्न विज्ञानको ही प्रत्यक्ष मानता है और उसके द्वारा घटादि पदार्थोंकी सत्ताका अनुमान करता है। योगाचारके मतमें ‘निरालम्ब विज्ञान’ मात्रकी ही सत्ता है, बाह्य पदार्थ स्वप्नमें देखी जानेवाली वस्तुओंकी भाँति मिथ्या है। माध्यमिक सबको शून्य ही मानता है। उसके मतमें दीपशिखाकी भाँति संस्कारवश क्षणिक विज्ञानकी धारा ही बाह्य पदार्थोंके रूपमें प्रतीत होती है। जैसे
सूत्र १८ ] अध्याय २ १८५
दीपककी शिखा प्रतिक्षण मिट रही है, फिर भी एक धारा-सी बनी रहनेके कारण उसकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार बाह्य पदार्थ भी प्रतिक्षण नष्ट हो रहे हैं, उनकी विज्ञान-धारामात्र प्रतीत होती है। जैसे तैल चुक जानेपर दीपशिखा बुझ जाती है, उसी प्रकार संस्कार नष्ट होनेपर विज्ञान-धारा भी शान्त हो जाती है। इस प्रकार अभाव या शून्यताकी प्राप्ति ही उसकी मान्यताके अनुसार अपवर्ग या मुक्ति है। इस सूत्रमें वैभाषिक तथा सौत्रान्तिकके मतको एक मानकर उसका निराकरण किया जाता है। उन दोनोंकी मान्यताका स्वरूप इस प्रकार है— रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा तथा संस्कार—ये पाँच स्कन्ध हैं। पृथिवी आदि चार भूत तथा भौतिक वस्तुएँ—शरीर, इन्द्रिय और विषय—ये 'रूपस्कन्ध' कहलाते हैं। पार्थिव परमाणु रूप, रस, गन्ध और स्पर्श—इन चार गुणोंसे युक्त एवं कठोर स्वभाववाले होते हैं; वे ही समुदायरूपमें एकत्र हो पृथिवीके आकारमें संगठित होते हैं। जलीय परमाणु, रूप, रस और स्पर्श—इन तीनोंसे युक्त एवं स्निग्ध स्वभावके होते हैं, वे ही जलके आकारमें संगठित होते हैं। तेजके परमाणु रूप और स्पर्श गुणसे युक्त एवं उष्ण स्वभाववाले हैं; वे अग्निके आकारमें संगठित हो जाते हैं। वायुके परमाणु स्पर्शकी योग्यतावाले एवं गतिशील होते हैं; वे ही वायुरूपमें संगठित होते हैं। फिर पृथिवी आदि चार भूत शरीर, इन्द्रिय और विषयरूपमें संगठित होते हैं। इस तरह ये चार प्रकारके क्षणिक परमाणु हैं, जो भूत-भौतिक संघातकी उत्पत्तिमें कारण बनते हैं। यह परमाणुहेतुक भूत-भौतिक वर्ग ही रूपस्कन्ध एवं बाह्य समुदाय कहलाता है। 'विज्ञानस्कन्ध' कहते हैं आभ्यन्तरिक विज्ञानके प्रवाहको। इसीमें 'मैं' की प्रतीति होती है। यही घट-ज्ञान; पट-ज्ञान आदिके रूपमें अविच्छिन्न धाराकी भाँति स्थित है। इसीको कर्ता, भोक्ता और आत्मा कहते हैं। इसीसे सारा लौकिक व्यवहार चलता है। सुख-दुःख आदिकी अनुभूतिका नाम 'वेदनास्कन्ध' है। उपलक्षणसे जो वस्तुकी प्रतीति करायी जाती है, जैसे ध्वजसे गृहकी और दण्डसे पुरुषकी, उसीका नाम 'संज्ञास्कन्ध'
१८६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
१८६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ है। राग, द्वेष, मोह, मद, मात्सर्य, भय, शोक और विषाद आदि जो चित्तके धर्म हैं, उन्हींको 'संस्कारस्कन्ध' कहते हैं। विज्ञान आदि चार स्कन्ध चित्त- चैत्तिक कहलाते हैं। विज्ञानस्कन्धरूप चित्तका नाम ही आत्मा है; शेष तीन स्कन्ध 'चैत्य' अथवा 'चैत्तिक' हैं। ये सब प्रकारके व्यवहारोंका आश्रय बनकर अन्तःकरणमें संगठित होते हैं। यह चारों स्कन्धोंका समुदाय या चित्त-चैत्तिक वर्ग 'आभ्यन्तर समुदाय' कहा गया है। इन दोनों समुदायोंसे भिन्न और किसी वस्तु (आत्मा, आकाश आदि)-की सत्ता ही नहीं है। ये ही दोनों बाह्य और आभ्यन्तर समुदाय समस्त लोक-व्यवहारके निर्वाहक हैं। इनसे ही सब कार्य चल जाता है, इसलिये नित्य 'आत्मा' को माननेकी आवश्यकता ही नहीं है। इसके उत्तरमें कहा जाता है कि परमाणु जिसमें हेतु बताये गये हैं, वह भूत-भौतिक बाह्य समुदाय और स्कन्धहेतुक आभ्यन्तर समुदाय—ये दोनों प्रकारके समुदाय तुम्हारे कथनानुसार मान लिये जायँ तो भी उक्त समुदायकी सिद्धि असम्भव ही है, क्योंकि समुदायके अन्तर्गत जो वस्तुएँ हैं, वे सब अचेतन हैं, एक-दूसरेकी अपेक्षासे शून्य हैं। अतः उनके द्वारा समुदाय अथवा संघात बना लेना असम्भव है। परमाणु आदि सभी वस्तुएँ तुम्हारी मान्यताके अनुसार क्षणिक भी हैं। एक क्षणमें जो परमाणु हैं, वे दूसरे क्षणमें नहीं हैं। फिर वे क्षणविध्वंसी परमाणु और पृथिवी आदि भूत इस समुदाय या संघातके रूपमें एकत्र होनेका प्रयत्न कैसे कर सकते हैं, कैसे उनका संघात बन सकता है अर्थात् किसी प्रकार और कभी भी नहीं बन सकता; इसलिये उनके संघातपूर्वक जगत्-उत्पत्तकी कल्पना करना सर्वथा युक्तिविरुद्ध है; अतः वैभाषिक और सौत्रान्तिकोंका मत माननेयोग्य नहीं है। सम्बन्ध— पूर्वपक्षीकी ओरसे दिये जानेवाले समाधानका स्वयं उल्लेख करके सूत्रकार उसका खण्डन करते हैं— इतरेतरप्रत्ययत्वादितिचेन्नोत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात्॥ २। २। १९॥ चेत्=यदि कहो; इतरेतरप्रत्ययत्वात्=अविद्या, संस्कार, विज्ञान आदिमेंसे
सूत्र १९ ] अध्याय २ १८७ एक-एक दूसरे-दूसरेके कारण होते हैं, अतः इन्हींसे समुदायकी सिद्धि हो सकती है; इति न = तो यह ठीक नहीं है; उत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् = क्योंकि ये अविद्या आदि उत्तरोत्तरकी उत्पत्तिमात्रमें ही निमित्त माने गये हैं (समुदाय या संघातमें नहीं; अतः इनसे भी समुदायकी सिद्धि नहीं हो सकती)। व्याख्या—बौद्धशास्त्रमें विज्ञानसंततिके कुछ हेतु माने गये हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं—अविद्या, संस्कार, विज्ञान, नाम, रूप, षडायतन स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान, भव, जाति, जरा, मरण, शोक, परिदेवना, दुःख तथा दुर्मनस्ता आदि क्षणिक वस्तुओंमें नित्यता और स्थिरता आदिका जो भ्रम है, वही ‘अविद्या’ कहलाता है। यह अविद्या विषयोंमें रागादिरूप ‘संस्कार’ उत्पन्न करनेमें कारण बनती है। वह संस्कार गर्भस्थ शिशुमें आलय ‘विज्ञान’ उत्पन्न करता है। उस आलय-विज्ञानसे पृथिवी आदि चार भूत होते हैं, जो शरीर एवं समुदायके कारण हैं। वही नामका आश्रय होनेसे ‘नाम’ भी कहा गया है। वह नाम ही श्याम-गौर आदि रूपवाले शरीरका उत्पादक होता है। गर्भस्थ शरीरकी जो कलल-बुद्बुद आदि अवस्थाएँ हैं, उन्हींको नाम तथा ‘रूप’ शब्दका वाच्य कहा गया है। पृथिवी आदि चार भूत, नाम, रूप, शरीर, विज्ञान और धातु—ये छः जिनके आश्रय हैं, उन इन्द्रियोंके समूहको ‘षडायतन’ कहा गया है। नाम, रूप तथा इन्द्रियोंके परस्पर सम्बन्धका नाम ‘स्पर्श’ है। उससे सुख आदिकी ‘वेदना’ (अनुभूति) होती है। उससे क्रमशः तृष्णा, उपादान, भव, जाति, जरावस्था, मृत्यु, शोक, परिदेवना तथा दुर्मनस्ता (मनकी उद्विग्नता) आदि भी इसी प्रकार उत्पन्न होते हैं। तत्पश्चात् पुनः अविद्या आदिके क्रमसे पूर्वोक्त सभी बातें प्रकट होती रहती हैं। ये घटीयन्त्र (रहट)-की भाँति निरन्तर चक्कर लगाते हैं, अतः यदि इस मान्यताको लेकर कहा जाय कि इन्हींसे समुदायकी भी सिद्धि हो जाती है तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि पूर्वोक्त अविद्या आदिमेंसे जो पूर्ववर्ती है, वह बादमें कहे हुए संस्कार आदिकी उत्पत्तिमात्रमें कारण होता है, संघातकी उत्पत्तिमें नहीं; अतः उसकी सिद्धि असम्भव है।
१८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
१८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध— पूर्वसूत्रमें यह बात बतायी गयी कि अविद्या आदि हेतु संस्कार आदिकी उत्पत्तिमात्रमें ही निमित्त माने गये हैं, अतः उनसे संघात (समुदाय)- की सिद्धि नहीं हो सकती। अब यह सिद्ध करते हैं कि वे अविद्या आदि हेतु संस्कार आदि भावोंकी उत्पत्तिमें भी निमित्त नहीं हो सकते— उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् ॥ २।२।२०॥ च=तथा; उत्तरोत्पादे=बादमें होनेवाले भावकी उत्पत्तिके समय; पूर्वनिरोधात्=पहले क्षणमें विद्यमान कारणका नाश हो जाता है, इसलिये (पूर्वोक्त अविद्या आदि हेतु, संस्कार आदि उत्तरोत्तर भावोंकी उत्पत्तिमें कारण नहीं हो सकते)। व्याख्या—घट और वस्त्र आदिमें यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि कारणभूत मृत्तिका और तन्तु आदि अपने कार्यके साथ विद्यमान रहते हैं। तभी उनमें कार्य-कारणभावकी सिद्धि होती है; किंतु बौद्धमतमें समस्त पदार्थोंका प्रत्येक क्षणमें नाश माना गया है, अतः उनके मतानुसार कार्यमें कारणकी विद्यमानता सिद्ध नहीं होगी। जिस क्षणमें कार्यकी उत्पत्ति होगी, उसी क्षणमें कारणका निरोध अर्थात् विनाश हो जायगा; इसलिये उनकी मान्यताके अनुसार कारण-कार्यभावकी सिद्धि न होनेसे वे अविद्या आदि हेतु, संस्कार आदि उत्तरोत्तर भावोंकी उत्पत्तिके कारण नहीं हो सकते। सम्बन्ध—कारणके न रहनेपर भी कार्यकी उत्पत्ति मान लें तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्यमन्यथा ॥ २।२।२१॥ असति=कारणके न रहनेपर (भी कार्यकी उत्पत्ति माननेसे); प्रतिज्ञोपरोधः=प्रतिज्ञा भंग होगी; अन्यथा=नहीं तो; यौगपद्यम्=कारण और कार्यकी एक कालमें सत्ता माननी पड़ेगी। व्याख्या—बौद्धमतमें चार हेतुओंसे विज्ञानकी उत्पत्ति मानी गयी है,
सूत्र २२ ] अध्याय २ १८९
सूत्र २२ ] अध्याय २ १८९ उनके नाम इस प्रकार हैं- अधिपतिप्रत्यय, सहकारिप्रत्यय, समनन्तरप्रत्यय और आलम्बनप्रत्यय। ये क्रमशः इन्द्रिय, प्रकाश, मनोयोग और विषयके पर्याय हैं। इन चारों हेतुओंके होनेपर ही विज्ञानकी उत्पत्ति होती है, यह उनकी प्रतिज्ञा है। यदि कारणके बिना ही कार्यकी उत्पत्ति मानी जाय तो उक्त प्रतिज्ञा भंग होगी और यदि ऐसा नहीं मानते हैं तो कारण और कार्य दोनोंकी एक कालमें सत्ता माननी पड़ेगी; अतः किसी प्रकार भी उनका मत समीचीन अथवा उपादेय नहीं है। सम्बन्ध - बौद्धमतानुयायी यह मानते हैं कि प्रतिसंख्या-निरोध, अप्रति- संख्यानिरोध तथा आकाश- इन तीनोंके अतिरिक्त समस्त वस्तुएँ क्षणिक (प्रतिक्षण नष्ट होनेवाली) हैं। दोनों निरोध और आकाश तो कोई वस्तु ही नहीं हैं, ये अभावमात्र हैं। निरोध तो विनाशका बोधक होनेसे अभाव है ही, आकाश भी आवरणका अभावमात्र ही है। इनमेंसे आकाशकी अभावरूपताका निराकरण तो २४ वें सूत्रमें किया जायगा। यहाँ उनके माने हुए दो प्रकारके निरोधोंका निराकरण करनेके लिये कहते हैं- प्रतिसंख्याप्रतिसंख्यानिरोधाप्राप्तिरविच्छेदात् ॥ २।२।२२॥ प्रतिसंख्याप्रतिसंख्यानिरोधाप्राप्तिः = प्रतिसंख्यानिरोध और अप्रति- संख्यानिरोध - इन दो प्रकारके निरोधोंकी सिद्धि नहीं हो सकती; अविच्छेदात् = क्योंकि संतान (प्रवाह)-का विच्छेद नहीं होता। व्याख्या- उनके मतमें जो बुद्धिपूर्वक सहेतुक विनाश है उसका नाम प्रतिसंख्यानिरोध है। यह तो पूर्णज्ञानसे होनेवाले आत्यन्तिक प्रलयका वाचक है। दूसरा जो स्वभावसे ही बिना किसी निमित्तके अबुद्धिपूर्वक विनाश होता है, उसका नाम अप्रतिसंख्यानिरोध है। यह स्वाभाविक प्रलय है। यह दोनों प्रकारका निरोध - किसी वस्तुका न रहना उनके मतानुसार सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि वे समस्त पदार्थोंको प्रतिक्षण विनाशशील मानते हैं और असत् कारणोंसे 'सत्' कार्यकी उत्पत्ति भी प्रतिक्षण स्वीकार करते हैं। इस मान्यताके अनुसार एक पदार्थका नाश और दूसरेकी उत्पत्तिका क्रम विद्यमान
१९० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ रहनेसे दोनोंकी परम्परा निरन्तर चलती ही रहेगी। इसके रुकनेका कोई भी कारण उनकी मान्यताके अनुसार नहीं है। इसीलिये किसी प्रकारके निरोधकी सिद्धि नहीं होगी। सम्बन्ध— बौद्धमतवाले ऐसा मानते हैं कि सब पदार्थ क्षणिक और असत्य होते हुए भी भ्रान्तिरूप अविद्याके कारण स्थिर और सत्य प्रतीत होते हैं। ज्ञानके द्वारा अविद्याका अभाव होनेसे सबका अभाव हो जाता है। इस प्रकार बुद्धिपूर्वक निरोधकी सिद्धि होती है। इसका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— उभयथा च दोषात्॥ २। २। २३॥ उभयथा=दोनों प्रकारसे; च=भी; दोषात्=दोष आता है, इसलिये (उनकी मान्यता युक्तिसंगत नहीं है)। व्याख्या—यदि यह माना जाय कि भ्रान्तिरूप अविद्यासे प्रतीत होनेवाला यह जगत् पूर्ण ज्ञानसे अविद्याका नाश होनेपर उसीके साथ नष्ट हो जाता है तब तो जो बिना कारणके अपने-आप विनाश—सब पदार्थोंका अभाव माना गया है, उस अप्रतिसंख्यानिरोधकी मान्यतामें विरोध आवेगा तथा यदि यह माना जाय कि भ्रान्तिसे प्रतीत होनेवाला जगत् बिना पूर्ण ज्ञानके अपने-आप नष्ट हो जाता है, तब ज्ञान और उसके साधनका उपदेश व्यर्थ होगा। अतः उनका मत किसी प्रकार भी युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध—अब आकाश कोई पदार्थ नहीं, किंतु आवरणका अभावमात्र है, इस मान्यताका खण्डन करते हैं— आकाशे चाविशेषात्॥ २। २। २४॥ आकाशे=आकाशके विषयमें; च=भी, उनकी मान्यता ठीक नहीं है; अविशेषात्=क्योंकि अन्य भाव-पदार्थोंसे उसमें कोई विशेषता नहीं है। व्याख्या—पृथिवी, जल आदि जितने भी भाव-पदार्थ देखे जाते हैं, उन्हींकी भाँति आकाश भी भावरूप है। आकाशकी भी सत्ताका सबको बोध