वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—यदि कहो कि 'जैसे अचेतन दूध बछड़ेकी पुष्टिके लिये अपने-आप गायके थनमें उतर आता है* तथा अचेतन जल लोगोंके उपकारके लिये अपने-आप नदी-निर्झर आदिके रूपमें बहता रहता है, उसी प्रकार जड प्रधान भी जगत्की सृष्टिके कार्यमें बिना चेतनके ही स्वयं प्रवृत्त हो सकता है' तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि जिस प्रकार रथ आदि अचेतन वस्तुएँ बिना चेतनका सहयोग पाये संचरण आदि कार्योंमें प्रवृत्त नहीं होतीं, उसी प्रकार थनमें दूध उतरने और नदी-निर्झर आदिके बहनेमें भी अव्यक्त चेतनकी ही प्रेरणा काम करती है, यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है। शास्त्र भी इस अनुमानका समर्थक है—'योऽप्सु तिष्ठन्... अपोऽन्तरो यमयति।' (बृह० उ० ३।७।४) अर्थात् 'जो जलमें रहनेवाला है और उसके भीतर रहकर उसका नियमन करता है।' 'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते' (बृह० उ० ३।८।९) अर्थात् 'हे गार्गि! इस अक्षर (परमात्मा)-के ही प्रशासनमें पूर्ववाहिनी तथा अन्य नदियाँ बहती हैं।' इत्यादि श्रुतिवाक्योंसे सिद्ध होता है कि समस्त जड वस्तुओंका संचालक चेतन है। गायके थनमें जो दूध उतरता है, उसमें भी चेतन गौका वात्सल्य और चेतन बछड़ेका चूसना कारण है। इसी प्रकार जल नीची भूमिकी ओर ही स्वभावतः बहता है। लोगोंके उपकारके लिये वह स्वयं उठकर ऊँची भूमिपर नहीं चला जाता। परंतु चेतन पुरुष अपने प्रयत्नसे उस जलके प्रवाहको जिधर चाहें मोड़ सकते हैं। इस प्रकार प्रत्येक प्रवृत्तिमें चेतनकी अपेक्षा सर्वत्र देखी जाती है; इसलिये किसी भी युक्तिसे जड प्रधानका स्वतः जगत्की रचनामें प्रवृत्त होना सिद्ध नहीं होता। सम्बन्ध—अब प्रकारान्तरसे प्रधानकारणवादका खण्डन करते हैं—
- अचेतनत्वेऽपि क्षीरवच्चेष्टितं प्रधानस्य। (सां० सू० ३।१७०)