भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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सूत्र २-३ ] अध्याय २ १७१ बुद्धिमान् वैज्ञानिक तथा चतुर शिल्पी मनसे भी नहीं कर पाते, उस विचित्र रचना-चातुर्ययुक्त अद्भुत जगत्‌की सृष्टि भला जड प्रकृति कैसे कर सकती है ? मिट्टी, पत्थर आदि जड पदार्थोंमें इस प्रकार अपने-आप रचना करनेकी कोई शक्ति नहीं देखी जाती है। अतः किसी भी युक्तिसे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि जड प्रधान इस जगत्‌का कारण है। सम्बन्ध- अब दूसरी युक्तिसे प्रधानकारणवादका खण्डन करते हैं— प्रवृत्तेश्च ॥ २।२।२॥ प्रवृत्तेः=जगत्‌की रचनाके लिये जड प्रकृतिका प्रवृत्त होना; च=भी सिद्ध नहीं होता (इसलिये प्रधान इस जगत्‌का कारण नहीं है)। व्याख्या - जगत्‌की रचना करना तो दूर रहा, रचनादि कार्यके लिये जड प्रकृतिमें प्रवृत्तिका होना भी असम्भव जान पड़ता है; क्योंकि साम्यावस्थामें स्थित सत्त्व, रज और तम- इन तीनों गुणोंका नाम प्रधान या प्रकृति है*, उस जड प्रधानका बिना किसी चेतनकी सहायताके सृष्टिकार्य प्रारम्भ करनेके लिये प्रवृत्त होना कदापि सम्भव नहीं है। कोई भी जड पदार्थ चेतनका सहयोग प्राप्त हुए बिना कभी अपने-आप किसी कार्यमें प्रवृत्त होता हो, ऐसा नहीं देखा जाता है। सम्बन्ध- अब पूर्वपक्षीके द्वारा दिये जानेवाले जल आदिके दृष्टान्तमें भी चेतनका सहयोग दिखलाकर उपर्युक्त बातकी ही सिद्धि करते हैं— पयोऽम्बुवच्चेत्तत्रापि ॥ २।२।३॥ चेत्=यदि कहो; पयोऽम्बुवत्=दूध और जलकी भाँति (जड प्रधानका सृष्टि-रचनाके लिये प्रवृत्त होना सम्भव है); तत्रापि=तो उसमें भी चेतनका सहयोग है (अतः केवल जडमें प्रवृत्ति न होनेसे उसके द्वारा जगत्‌की रचना असम्भव है)।

  • सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः। (सां० सू० १। ६१)