भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

सूत्र ४-५ ] अध्याय २ १७३ व्यतिरेकानवस्थितेश्च अनपेक्षत्वात् ॥ २।२।४॥ च=इसके सिवा; व्यतिरेकानवस्थितेः=सांख्यमतमें प्रधानके सिवा, दूसरा कोई उसकी प्रवृत्ति या निवृत्तिका नियामक नहीं माना गया है, इसलिये; (और) अनपेक्षत्वात्=प्रधानको किसीकी अपेक्षा नहीं है, (इसलिये भी प्रधान कभी सृष्टिरूपमें परिणत होता और कभी नहीं होता है, यह बात सम्भव नहीं जान पड़ती।) व्याख्या—सांख्यमतावलम्बियोंकी मान्यताके अनुसार त्रिगुणात्मक प्रधानके सिवा, दूसरा कोई कारण, प्रेरक या प्रवर्तक नहीं माना गया है। पुरुष उदासीन है, वह न तो प्रधानका प्रवर्तक है, न निवर्तक। प्रधान स्वयं भी अनपेक्ष है, वह किसी दूसरेकी अपेक्षा नहीं रखता। ऐसी स्थितिमें जड प्रधान कभी तो महत्तत्त्व आदि विकारोंके रूपमें परिणत होता है और कभी नहीं होता है, यह कैसे युक्तिसंगत होगा। यदि जगत्की उत्पत्ति करना उसका स्वभाव अथवा धर्म है, तब तो प्रलयके कार्यमें उसकी प्रवृत्ति नहीं होगी ? और यदि स्वभाव नहीं है तो उत्पत्तिके लिये प्रवृत्ति नहीं होगी। इस प्रकार कोई भी व्यवस्था न हो सकनेके कारण प्रधान जगत्का कारण नहीं हो सकता। सम्बन्ध—तृणसे दूध बननेकी भाँति प्रकृतिसे स्वभावतः जगत्की उत्पत्ति होती है, इस कथनकी असंगति दिखाते हुए कहते हैं— अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् ॥ २।२।५॥ अन्यत्र=दूसरे स्थानमें; अभावात्=वैसे परिणामका अभाव है, इसलिये; च=भी; तृणादिवत्=तृण आदिकी भाँति; (प्रधानका जगत्के रूपमें परिणत होना) न=नहीं सिद्ध होता। व्याख्या—जो घास ब्यायी हुई गौद्वारा खायी जाती है, उसीसे दूध बनता है। वही घास यदि बैल या घोड़ेको खिला दी जाय या अन्यत्र रख दी जाय तो उससे दूध नहीं बनता। इस प्रकार अन्य स्थानोंमें घास आदिका वैसा परिणाम दृष्टिगोचर नहीं होता; इससे यह सिद्ध होता है कि विशिष्ट चेतनके