वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सहयोग बिना जड प्रकृति जगत्-रूपमें परिणत नहीं हो सकती। जैसे तृण आदिका दूधके रूपमें परिणत होना तभी सम्भव होता है, जब उसे ब्यायी हुई चेतन गौके उदरमें स्थित होनेका अवसर मिलता है। सम्बन्ध—प्रधानमें जगत्-रचनाकी स्वाभाविक प्रवृत्ति मानना व्यर्थ है, यह बतानेके लिये कहते हैं— अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् ॥ २ । २ । ६ ॥ अभ्युपगमे=(अनुमानसे प्रधानमें सृष्टिरचनाकी स्वाभाविक प्रवृत्ति) स्वीकार कर लेनेपर; अपि=भी; अर्थाभावात्=कोई प्रयोजन न होनेके कारण (यह मान्यता व्यर्थ ही होगी)। व्याख्या—यद्यपि चेतनकी प्रेरणाके बिना जड प्रकृतिका सृष्टि-रचना आदि कार्यमें प्रवृत्त होना नहीं बन सकता, तथापि यदि यह मान लिया जाय कि स्वभावसे ही प्रधान जगत्की उत्पत्तिके कार्यमें प्रवृत्त हो सकता है तो इसके लिये कोई प्रयोजन नहीं दिखायी देता; क्योंकि सांख्यमतमें माना गया है कि प्रधानकी प्रवृत्ति पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये ही होती है। * परंतु उनकी मान्यताके अनुसार पुरुष असंग, चैतन्यमात्र, निष्क्रिय, निर्विकार, उदासीन, निर्मल तथा नित्यशुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव है; उसके लिये प्रकृतिदर्शनरूप भोग तथा उससे विमुक्त होनारूप अपवर्ग दोनोंकी ही आवश्यकता नहीं है। इसलिये उनका माना हुआ प्रयोजन व्यर्थ ही है। अतः प्रधानकी लोकरचनाके कार्यमें स्वाभाविक प्रवृत्ति मानना निरर्थक है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे सांख्यमतकी मान्यतामें दोष दिखाते हैं— पुरुषाश्मवदिति चेत्तथापि ॥ २ । २ । ७ ॥ चेत् इति=यदि ऐसा कहो कि; पुरुषाश्मवत्= अंधे और पंगु पुरुषों तथा लोह और चुम्बकके संयोगकी भाँति (प्रकृति-पुरुषकी समीपता ही प्रकृतिको
- पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य। (सां० का० २१)