वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ७ ] अध्याय २ १७५ सृष्टिरचनामें प्रवृत्त कर देती है); तथापि=तो ऐसा माननेपर भी (सांख्य- सिद्धान्तकी सिद्धि नहीं होती)। व्याख्या—'जैसे पंगु और अंधे परस्पर मिल जायँ और अंधेके कंधेपर बैठकर पंगु उसे राह बताया करे तो दोनों गन्तव्य स्थानपर पहुँच जाते हैं तथा लोहे और चुम्बकका संयोग होनेपर लोहेमें क्रियाशक्ति आ जाती है, उसी प्रकार पुरुष और प्रकृतिका संयोग ही सृष्टिरचनाका कारण है।* पुरुषकी समीपतामात्रसे जड प्रकृति जगत्की उत्पत्ति आदिके कार्यमें प्रवृत्त हो जाती है।' सांख्यवादियोंकी कही हुई यह बात मान ली जाय तो भी इससे सांख्य-सिद्धान्तकी पुष्टि नहीं होती, क्योंकि पंगु और अंधे दोनों चेतन हैं, एक गमनशक्तिसे रहित होनेपर भी बौद्धिक आदि अन्य शक्तियोंसे सम्पन्न है; अंधा पुरुष देखनेकी शक्तिसे हीन होनेपर भी गमन एवं बुद्धि आदिकी शक्तिसे युक्त है। एक प्रेरणा देता है तो दूसरा उसे समझकर उसके अनुसार चलता है; अतः वहाँ भी चेतनका सहयोग स्पष्ट ही है। इसी प्रकार चुम्बक और लोहेको एक-दूसरेके समीप लानेके लिये एक तीसरे चेतन पुरुषकी आवश्यकता होती है। चेतनके सहयोग बिना न तो लोहा चुम्बकके समीप जायगा और न उसमें क्रियाशक्ति उत्पन्न होगी। समीपता प्राप्त होनेपर भी दोनों एक-दूसरेसे सट जायँगे, लोहेमें किसी प्रकारकी आवश्यक क्रियाका संचार नहीं होगा, अतः ये दोनों दृष्टान्त इसी बातकी पुष्टि करते हैं कि चेतनकी प्रेरणा होनेसे ही जड प्रधान सृष्टि-कार्यमें प्रवृत्त हो सकता है; अन्यथा नहीं; परंतु सांख्यमतमें तो पुरुष असंग और उदासीन माना गया है, अतः वह प्रेरक हो नहीं सकता। इसलिये केवल जड प्रकृतिके द्वारा जगत्की उत्पत्ति किसी प्रकार भी सिद्ध नहीं हो सकती। सम्बन्ध— अब प्रधानकारणवादके विरोधमें दूसरी युक्ति देते हैं—
- पङ्गवन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः ॥ (सां० कारिका २१)