वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 179, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें१७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ अङ्गित्वानुपपत्तेश्च ॥ २ । २ । ८ ॥ अङ्गित्वानुपपत्तेः = अंगांगिभाव (सत्त्वादि गुणोंके उत्कर्ष और अपकर्ष)- की सिद्धि न होनेके कारण; च = भी (केवल प्रधान इस जगत्का कारण नहीं माना जा सकता)। व्याख्या—पहले यह बताया गया है कि सांख्यमतमें तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाका नाम 'प्रधान' है। यदि गुणोंकी यह साम्यावस्था स्वाभाविक मानी जाय, तब तो कभी भी भंग न होगी, अतएव गुणोंमें विषमता न होनेके कारण अंगांगिभावकी सिद्धि न हो सकेगी; क्योंकि उन गुणोंमें ह्रास और वृद्धि होनेपर ही बढ़े हुए गुणको अंगी और घटे हुए गुणको अंग माना जाता है। यदि उन गुणोंकी विषमता (ह्रास-वृद्धि)-को ही स्वाभाविक माना जाय तब तो सदा जगत्की सृष्टिका ही क्रम चलता रहेगा, प्रलय कभी होगा ही नहीं। यदि पुरुषकी प्रेरणासे प्रकृतिके गुणोंमें क्षोभ होना मान लें तब तो पुरुषको असंग और निष्क्रिय मानना नहीं बन सकेगा। यदि परमेश्वरको प्रेरक माना जाय तब तो यह ब्रह्मकारणवादको ही स्वीकार करना होगा। इस प्रकार सांख्यमतके अनुसार गुणोंका अंगांगिभाव सिद्ध न होनेके कारण जड प्रधानको जगत्का कारण मानना असंगत है। सम्बन्ध—यदि अन्य प्रकारसे गुणोंकी साम्यावस्था भंग होकर प्रकृतिके द्वारा जगत्की उत्पत्ति होती है, ऐसा मान लिया जाय तो क्या हानि है? इसपर कहते हैं— अन्यथानुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात् ॥ २ । २ । ९ ॥ अन्यथा = दूसरे प्रकारसे; अनुमितौ = साम्यावस्था भंग होनेका अनुमान कर लेनेपर; च = भी; ज्ञशक्तिवियोगात् = प्रधानमें ज्ञानशक्ति न होनेके कारण (गृह, घट, पट आदिकी भाँति बुद्धिपूर्वक रची जानेवाली वस्तुओंकी उत्पत्ति उसके द्वारा नहीं हो सकती)। व्याख्या—यदि गुणोंकी साम्यावस्थाका भंग होना काल आदि अन्य निमित्तोंसे मान लिया जाय तो भी प्रधानमें ज्ञानशक्तिका अभाव तो है ही।