भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 486 में से

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सूत्र २७ ] अध्याय २ १५९ श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात् ॥ २ । १ । २७ ॥ तु = किंतु (यह दोष नहीं आता, क्योंकि); श्रुतेः = श्रुतिसे (यह सिद्ध है कि ब्रह्म जगत्का कारण होता हुआ भी निर्विकाररूपसे स्थित है); शब्द मूलत्वात् = ब्रह्मका स्वरूप कैसा है? इसमें वेद ही प्रमाण है (इसलिये वेद जैसा वर्णन करता है, वैसा ही उसका स्वरूप मानना चाहिये)। व्याख्या - पूर्वपक्षीने जो दोष उपस्थित किये हैं; वे सिद्धान्तपक्षपर लागू नहीं होते; क्योंकि वह श्रुतिपर आधारित है। श्रुतिने जिस प्रकार ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति बतायी है, उसी प्रकार निर्विकार रूपसे ब्रह्मकी स्थितिका भी प्रतिपादन किया है। (देखिये श्वेताश्वतर० ६ । १६ - १९१ तथा मुण्डक० १।१।९२) अतः श्रुतिप्रमाणसे यही मानना ठीक है कि ब्रह्म जगत्का कारण होता हुआ भी निर्विकार रूपसे नित्य स्थित है। वह अवयवरहित और निष्क्रिय होते हुए ही जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है। उस सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके लिये कोई बात असम्भव नहीं है। वह मन-इन्द्रिय आदिसे अतीत है, इनका विषय नहीं है। उसकी सिद्धि कोरे तर्क और युक्तिसे नहीं होती। उसके लिये तो वेद ही सर्वोपरि निर्भ्रान्त प्रमाण है। वेदने उसका स्वरूप जैसा बताया है, वैसा ही मानना चाहिये। वेद उस परब्रह्मको अवयव- रहित बतानेके साथ ही यह भी कहता है कि 'वह सम्पूर्णरूपेण जगत्के आकारमें परिणत नहीं होता।' यह समस्त ब्रह्माण्ड ब्रह्मके एक पादमें स्थित है, शेष अमृतस्वरूप तीन पाद परमधाममें स्थित हैं, ३ ऐसा श्रुतिने स्पष्ट १-स विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद्यः । (श्वेता० ६ । १६) निष्कलं निष्क्रियँ शान्तं निरवद्यं निरंजनम् । (श्वेता० ६ । १९) २-यह मन्त्र सूत्र २ । १ । ३० की व्याख्यामें है। ३-तावानस्य महिमा ततो ज्यायाश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (छा० उ० ३ । १२ । ६)