भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 486 में से

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१५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ परमेश्वरको इस जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण माननेमें क्या आपत्ति हो सकती है। सम्बन्ध— उपर्युक्त बातको दृढ़ करनेके लिये शंका उपस्थित करते हैं— कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा॥ २।१।२६॥ कृत्स्नप्रसक्तिः = (ब्रह्मको जगत्का कारण माननेपर) वह पूर्णरूपसे जगत्के रूपमें परिणत हो गया, ऐसा माननेका दोष उपस्थित होगा; वा = अथवा; निरवयवत्वशब्दकोपः = उसको अवयवरहित बतानेवाले श्रुतिके शब्दोंसे विरोध होगा। व्याख्या— पूर्वपक्षका कहना है कि यदि ब्रह्मको जगत्का कारण माना जायगा तो उसमें दो दोष आवेंगे। एक तो यह कि ब्रह्म अवयवरहित होनेके कारण अपने सम्पूर्ण रूपसे ही जगत्के आकारमें परिणत हो गया, ऐसा मानना पड़ेगा, फिर जगत्से भिन्न ब्रह्मनामकी कोई वस्तु नहीं रही। यदि ब्रह्म सावयव होता तो ऐसा समझते कि उसके शरीरका एक अंश विकृत होकर जगत्-रूपमें परिणत हो गया और शेष अंश ब्रह्मरूपमें ही स्थित है; परंतु वह अवयवयुक्त तो है नहीं; क्योंकि श्रुति उसे 'निष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निरवद्य और निरंजन' बताती है१, दिव्य और अमूर्त आदि विशेषणोंसे विभूषित करती है।२ ऐसी दशामें पूर्णतः ब्रह्मका परिणाम मान लेनेपर उसके श्रवण, मनन और निदिध्यासन आदिका उपदेश व्यर्थ होगा। और यदि इस दोषसे बचनेके लिये ब्रह्मको सावयव मान लिया जाय तब तो उसे 'अवयवरहित अजन्मा' आदि बतानेवाले श्रुतिके शब्दोंसे स्पष्ट ही विरोध आता है; सावयव होनेपर वह नित्य और सनातन भी नहीं रह सकेगा; इसलिये ब्रह्मको जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध— इस शंकाके उत्तरमें कहते हैं— १-निष्कलँ निष्क्रियँ शान्तं निरवद्यं निरंजनम्। (श्वेता० ६।१९) २-दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः। (मु० उ० २।१।२)