भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 166

सूत्र ३१-३२ ] अध्याय २ १६३ विकरणत्वान्नेति चेत्तदुक्तम्॥ २। १। ३१॥ ( श्रुतिमें उस परमात्माको) विकरणत्वात्= मन और इन्द्रिय आदि कारणोंसे रहित बताया गया है, इसलिये; न=(वह) जगत्का कारण नहीं है; चेत्=यदि; इति= ऐसा कहो; तदुक्तम्= तो उसका उत्तर दिया जा चुका है। व्याख्या-यदि कहो, 'ब्रह्मको शरीर, बुद्धि, मन और इन्द्रिय आदि करणोंसे रहित कहा गया है, (श्वेता० ६। ८) इसलिये वह जगत्का बनानेवाला नहीं हो सकता' तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि इसका उत्तर पहले 'सर्वोपेता च तद्दर्शनात्' (२। १। ३०) इस सूत्रमें परब्रह्मको सर्वशक्तिसम्पन्न बताकर दे दिया गया है तथा श्रुतिने भी स्पष्ट शब्दोंमें यह कहा है कि वह परमेश्वर हाथ-पैर आदि समस्त इन्द्रियोंसे रहित होकर भी सबका कार्य करनेमें समर्थ है (श्वेता० ३। १९)*। इसलिये ब्रह्म ही जगत्का कारण है; ऐसा माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। सम्बन्ध - अब पुनः दूसरे प्रकारकी शंका उपस्थित करते हैं- न प्रयोजनवत्त्वात् ॥ २। १। ३२॥ न=परमात्मा जगत्का कारण नहीं हो सकता; प्रयोजनवत्त्वात् = क्योंकि प्रत्येक कार्य किसी-न-किसी प्रयोजनसे प्रयुक्त होता है (और परमात्मा पूर्णकाम होनेके कारण प्रयोजनरहित है)। व्याख्या - ब्रह्मका इस विचित्र जगत्की सृष्टि करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है; क्योंकि वह तो पूर्णकाम है। जीवोंके लिये भी जगत्की रचना करना आवश्यक नहीं है; क्योंकि परमेश्वरकी प्रवृत्ति तो सबका हित करनेके लिये ही होनी चाहिये। इस दुःखमय संसारसे जीवोंको कोई भी सुख मिलता हो, ऐसी बात नहीं है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि परमेश्वर जगत्का कर्ता नहीं

  • अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥