वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें१६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ है; क्योंकि जगत्में प्रत्येक कार्यकर्ता किसी-न-किसी प्रयोजनसे ही कार्य आरम्भ करता है। बिना किसी प्रयोजनके कोई भी कर्ममें प्रवृत्त नहीं होता। अतः परब्रह्मको जगत्का कर्ता नहीं मानना चाहिये। सम्बन्ध— पूर्वोक्त शंकाका उत्तर देते हैं— लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्॥ २।१।३३॥ तु=किंतु (उस परब्रह्म परमेश्वरका विश्वरचनादिरूप कर्ममें प्रवृत्त होना तो); लोकवत्=लोकमें आप्तकाम पुरुषोंकी भाँति; लीलाकैवल्यम्=केवल लीलामात्र है। व्याख्या—जैसे लोकमें देखा जाता है कि जो परमात्माको प्राप्त हो चुके हैं। जिनका जगत्से अपना कोई स्वार्थ नहीं रह गया है, कर्म करने या न करनेसे जिनका कोई प्रयोजन नहीं है, जो आप्तकाम और वीतराग हैं, ऐसे सिद्ध महापुरुषोंद्वारा बिना किसी प्रयोजनके जगत्का हित-साधन करनेवाले कर्म स्वभावतः किये जाते हैं; उनके कर्म किसी प्रकारका फल उत्पन्न करनेमें समर्थ न होनेके कारण केवल लीलामात्र ही हैं। उसी प्रकार उस परब्रह्म परमात्माका भी जगत्-रचना आदि कर्मोंसे अथवा मनुष्यादि-अवतार-शरीर धारण करके भाँति-भाँतिके लोकपावन चरित्र करनेसे अपना कोई प्रयोजन नहीं है तथा इन कर्मोंमें कर्तापनका अभिमान या आसक्ति भी नहीं है; इसलिये उनके कर्म केवल लीलामात्र ही हैं। इसीलिये शास्त्रोंमें परमेश्वरके कर्मोंको दिव्य (अलौकिक) एवं निर्मल बताया है। यद्यपि हमलोगोंकी दृष्टिमें संसारकी सृष्टिरूप कार्य महान् दुष्कर एवं गुरुतर है तथापि परमेश्वरकी यह लीलामात्र है; वे अनायास ही कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंकी रचना और संहार कर सकते हैं; क्योंकि उनकी शक्ति अनन्त है, इसलिये परमेश्वरके द्वारा बिना प्रयोजन इस जगत्की रचना आदि कार्यका होना उचित ही है।*
- भगवान् केवल संकल्पमात्रसे बिना किसी परिश्रमके इस विचित्र विश्वकी रचनामें