वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २६-२७ ] अध्याय २ २२३ सम्बन्ध — गुण अपने गुणीसे अलग कैसे होता है ? इसपर कहते हैं— व्यतिरेको गन्धवत् ॥ २ । ३ । २६ ॥ गन्धवत् = गन्धकी भाँति; व्यतिरेकः = गुणका गुणीसे अलग होना बन सकता है (अतः कोई विरोध नहीं है)। व्याख्या — यहाँ यह शंका भी नहीं करनी चाहिये कि गुण तो गुणीके साथ ही रहता है, वह गुणीसे अलग होकर कोई कार्य कैसे कर सकता है; क्योंकि जैसे गन्ध अपने गुणी पुष्प आदिसे अलग होकर स्थानान्तरमें फैल जाती है, उसी प्रकार आत्माका चेतनतारूप गुण भी आत्मासे अलग होकर समस्त शरीरमें व्याप्त हो जाता है; अतः कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध — इसी बातको श्रुतिप्रमाणसे दृढ़ करते हैं— तथा च दर्शयति ॥ २ । ३ । २७ ॥ तथा = ऐसा; च = ही; दर्शयति = श्रुति भी दिखलाती है। व्याख्या — केवल युक्तिसे ही यह बात सिद्ध होती हो, ऐसा नहीं; श्रुतिमें भी आत्माका एक जगह रहकर अपने गुणके द्वारा समस्त शरीरमें नखसे लोमतक व्याप्त होना दिखाया गया है। * अतः यह सिद्ध होता है कि आत्मा अणु है। सम्बन्ध — इस प्रकार पूर्वपक्षीद्वारा इक्कीसवें सूत्रसे लेकर सत्ताईसवें सूत्रतक जीवात्माका अणु होना सिद्ध किया गया; किंतु उसमें दी हुई युक्तियाँ सर्वथा निर्बल हैं और पूर्वपक्षीद्वारा उद्धृत श्रुति-प्रमाण तो आभासमात्र है ही, इसलिये अब सिद्धान्तीकी ओरसे अणुवादका खण्डन करके आत्माके विभुत्वकी सिद्धि की जाती है—
- स एष इह प्रविष्टः । आ नखाग्रेभ्यः । (बृह० उ० १।४।७) तौ होचतुः सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्यः प्रतिरूपमिति ॥ (छा० उ० ८।८।१)