भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 486 में से

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पृष्ठ 227

२२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ पृथगुपदेशात् ॥ २ । ३ । २८ ॥ पृथक् = (जीवात्माके विषयमें) अणुपरिमाणसे भिन्न; उपदेशात् = उपदेश श्रुतिमें मिलता है, इसलिये (जीवात्मा अणु नहीं, विभु है)। व्याख्या - पूर्वपक्षकी ओरसे जीवात्माको अणु बतानेके लिये जो प्रमाण दिया गया, उसी श्रुतिमें स्पष्ट शब्दोंमें जीवात्माको विभु बताया गया है। भाव यह कि जहाँ जीवात्माका स्वरूप बालाग्रके दस हजारवें भागके समान बताया है, वहीं उसको 'स चानन्त्याय कल्पते।' इस वाक्यसे अनन्त अर्थात् विभु होनेमें समर्थ कहा गया है (श्वेता० उ० ५। ९)। अतः प्रमाण देनेवालेको श्रुतिके अगले उपदेशपर भी दृष्टिपात करना चाहिये। इसके सिवा, कठोपनिषद् (१। ३। १०, १३; २। ३। ७) -में स्पष्ट ही जीवात्माका विशेषण 'महान्' आया है तथा गीतामें भी जीवात्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए स्पष्ट कहा है कि 'यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है' (गीता २। २४)। 'जिस प्रकार सब जगह व्याप्त हुआ भी आकाश सूक्ष्म होनेके कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा भी शरीरमें सब जगह स्थित है तो भी उससे लिप्त नहीं होता।' (गीता १३। ३२) तथा 'उस आत्माको तू अविनाशी समझ, जिससे यह समस्त जडसमुदाय व्याप्त है।' (गीता २। १७) - इन प्रमाणोंके विषयमें यह नहीं कहा जा सकता कि ये परमात्माके प्रकरणमें आये हैं। सम्बन्ध - इसपर यह जिज्ञासा होती है कि यदि ऐसी बात है तो श्रुतिमें जो स्पष्ट शब्दोंमें आत्माको अणु और अंगुष्ठमात्र कहा है, उसकी संगति कैसे होगी? इसपर कहते हैं- तद्गुणसारत्वात्तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ॥ २ । ३ । २९ ॥ तद्व्यपदेशः = वह कथन; तु = तो; तद्गुणसारत्वात् = उस बुद्धि आदिके गुणोंकी प्रधानताको लेकर है; प्राज्ञवत् = जैसे परमेश्वरको अणु और हृदयमें स्थित अंगुष्ठमात्र बताया है, वैसे ही जीवात्माके लिये भी समझना चाहिये।

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