वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 228, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २९ ] अध्याय २ २२५ व्याख्या—श्रुतिमें जीवात्माको अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला कहते हुए इस प्रकार वर्णन किया गया है— अंगुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः संकल्पाहंकारसमन्वितो यः। बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः॥ 'जो अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला, सूर्यके सदृश प्रकाशस्वरूप तथा संकल्प और अहंकारसे युक्त है, वह बुद्धिके गुणोंसे और शरीरके गुणोंसे ही आरेकी नोक-जैसे सूक्ष्म आकारवाला है—ऐसा परमात्मासे भिन्न जीवात्मा भी निःसंदेह ज्ञानियोंद्वारा देखा गया है।' (श्वेता० उ० ५।८) जीवात्माकी गति-आगतिका वर्णन भी शरीरादिके सम्बन्धसे ही है, (कौ० उ० ३।६; प्र० उ० ३।९, १०)¹। इससे यह बात बिलकुल स्पष्ट हो जाती है कि श्रुतिमें जहाँ कहीं जीवात्माको एकदेशी 'अंगुष्ठमात्र' या 'अणु' कहा गया है, वह बुद्धि और शरीरके गुणोंको लेकर ही है; जैसे परमात्माको भी जगह-जगह जीवात्माके हृदयमें स्थित (क० उ० १।३। १; प्र० उ० ६।२; मु० उ० २।१।१० तथा २।२।१; ३।१।५, ७; श्वेता० उ० ३।२०) तथा अंगुष्ठमात्र भी (क० उ० २।१।१२-१३) बताया है। वह कथन स्थानकी अपेक्षासे ही है, उसी प्रकार जीवात्माके विषयमें भी समझना चाहिये। वास्तवमें वह अणु नहीं, विभु है; इसमें कोई शंका नहीं है। पूर्वपक्षीने जो बृहदारण्यक और छान्दोग्य-श्रुतिका प्रमाण देकर यह बात कही कि 'वह एक जगह स्थित रहते हुए ही नखसे लोमतक व्याप्त है', वह कहना सर्वथा प्रकरणविरुद्ध है; क्योंकि उस प्रकरणमें आत्माके गुणकी व्याप्तिविषयक कोई बात ही नहीं कही गयी है।² तथा गन्ध, प्रदीप आदिका दृष्टान्त देकर जो गुणके द्वारा आत्माके चैतन्यकी व्याप्ति बतायी है, वह भी युक्तिसंगत १-यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति। २-देखो सूत्र २।३।२७ की टिप्पणी।