वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें आत्माका चैतन्यगुण विशिष्ट नहीं माना गया है, बल्कि परमेश्वरकी भाँति सत्, चेतन और आनन्द—ये उसके स्वरूपभूत लक्षण माने गये हैं। अतः जीवात्माको अणु मानना किसी प्रकार भी उचित नहीं है। सम्बन्ध— यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि इस प्रकार बुद्धि आदिके गुणोंके संयोगसे आत्माको अंगुष्ठमात्र तथा एकदेशी माना जायगा, स्वरूपसे नहीं, तब तो जब प्रलयकालमें आत्माके साथ बुद्धि आदिका सम्बन्ध नहीं रहेगा, उस समय समस्त जीवोंकी मुक्ति हो जायगी। अतः प्रलयके बाद सृष्टि भी नहीं हो सकेगी। यदि मुक्त जीवोंका पुनः उत्पन्न होना मान लिया जाय तो मुक्तिके अभावका प्रसंग उपस्थित होगा, इसपर कहते हैं— यावदात्मभावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात् ॥ २ । ३ । ३० ॥ यावदात्मभावित्वात् = जबतक स्थूल, सूक्ष्म या कारण—इनमेंसे किसी भी शरीरके साथ जीवात्माका सम्बन्ध रहता है, तबतक वह उस शरीरके अनुरूप, एकदेशी-सा रहता है, इसलिये; च = भी; दोषः = उक्त दोष; न = नहीं है; तद्दर्शनात् = श्रुतिमें भी ऐसा ही देखा गया है। व्याख्या— श्रुतिमें कहा गया है कि जीवका एक शरीरसे दूसरेमें जाते समय भी सूक्ष्मशरीरसे सम्बन्ध बना रहता है (प्र० उ० ३ । ९, १०), परलोकमें भी उसका शरीरसे सम्बन्ध माना गया है तथा सुषुप्ति और स्वप्नकालमें भी देहके साथ उसका सम्बन्ध बताया गया है (प्र० उ० ४ । २, ५)।*
- तस्मै स होवाच यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति। ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति। तेन तर्ह्येष पुरुषो न श्रृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ 'उससे उन सुप्रसिद्ध महर्षि पिप्पलादने कहा—गार्ग्य ! जिस प्रकार अस्त होते हुए सूर्यकी सब किरणें इस तेजोमण्डलमें एक हो जाती हैं; फिर उदय होनेपर वे सब पुनः- पुनः सब ओर फैलती रहती हैं। ठीक ऐसे ही (निद्राके समय) वे सब इन्द्रियाँ भी परमदेव