वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३१ ] अध्याय २ २२७ इसी प्रकार प्रलयकालमें भी कर्मसंस्कारोंके सहित कारणशरीरसे जीवात्माका सम्बन्ध रहता है; क्योंकि श्रुतिमें यह बात स्पष्ट कही है कि प्रलयकालमें यह विज्ञानात्मा समस्त इन्द्रियोंके सहित उस परब्रह्ममें स्थित होता है (प्र० उ० ४।११)* इसलिये सुषुप्ति और प्रलयकालमें समस्त जीवोंके मुक्त होनेका तथा मुक्त पुरुषोंके पुनर्जन्म आदिका कोई दोष नहीं आ सकता। सम्बन्ध—प्रलयकालमें तो समस्त जगत् परमात्मामें विलीन हो जाता है, वहाँ बुद्धि आदि तत्त्वोंकी भी परमात्मासे भिन्न सत्ता नहीं रहती। इस स्थितिमें बुद्धि आदिके समुदायरूप सूक्ष्म या कारणशरीरके साथ जीवात्माका सम्बन्ध कैसे रह सकता है? और यदि उस समय नहीं रहता है तो सृष्टिकालमें कैसे सम्बन्ध हो जाता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात्॥ २।३।३१॥ पुंस्त्वादिवत् = पुरुषत्व आदिकी भाँति; सतः = पहलेसे विद्यमान; अस्य = इस मनमें एक हो जाती हैं; इस कारण उस समय वह जीवात्मा न तो सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न मैथुनका आनन्द भोगता है, न मल-मूत्रका त्याग करता है और न चलता ही है। उस समय 'वह सो रहा है' ऐसा लोग कहते हैं।' अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति। यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति। देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चानुभूतं च सच्चासच्व सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति॥ 'इस स्वप्नावस्थामें यह जीवात्मा अपनी विभूतिका अनुभव करता है, जो बार-बार देखा हुआ है, उसीको बार-बार देखता है। बार-बार सुनी हुई बातको पुनः-पुनः सुनता है। नाना देश और दिशाओंमें बार-बार अनुभव किये हुए विषयोंको पुनः-पुनः अनुभव करता है। इतना ही नहीं, देखे और न देखे हुएको भी, सुने हुए और न सुने हुएको भी, अनुभव किये हुए और अनुभव न किये हुएको भी तथा विद्यमान और अविद्यमानको भी देखता है, इस प्रकार वह सारी घटनाओंको देखता है और सब कुछ स्वयं बनकर देखता है।'
- विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र। तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति॥