वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ (कारण शरीरादिके) सम्बन्धका; तु=ही; अभिव्यक्तियोगात्=(सृष्टिकालमें) प्रकट होनेका योग है, इसलिये (कोई दोष नहीं है)। व्याख्या—प्रलयकालमें यद्यपि बुद्धि आदि तत्त्व स्थूलरूपमें न रहकर अपने कारणरूप परब्रह्म परमेश्वरमें विलीन हो जाते हैं, तथापि भगवान्की अचिन्त्य शक्तिके रूपमें वे अव्यक्तरूपसे सब-के-सब विद्यमान रहते हैं। तथा सब जीवात्मा भी अपने-अपने कर्मसंस्काररूप कारणशरीरोंके सहित अव्यक्तरूपसे उस परब्रह्म परमेश्वरमें विलीन रहते हैं (प्र० उ० ४।११)।* उनके सम्बन्धका सर्वथा नाश नहीं होता। अतः सृष्टिकालमें उस परब्रह्म परमात्माके संकल्पसे वे उसी प्रकार सूक्ष्म और स्थूल रूपोंमें प्रकट हो जाते हैं, जैसे बीजरूपमें पहलेसे ही विद्यमान पुरुषत्व बाल्यकालमें प्रकट नहीं होता, किंतु युवावस्थामें शक्तिके संयोगसे प्रकट हो जाता है। यही बात बीज- वृक्षके सम्बन्धमें भी समझी जा सकती है। (गीता अध्याय १४ श्लोक ३ और ४ में यही बात स्पष्ट की गयी है) इसलिये कोई विरोध नहीं है। जिस साधकका अन्तःकरण साधनाके द्वारा जितना शुद्ध और व्यापक होता है, वह उतना ही विशाल हो जाता है। यही कारण है कि योगीमें दूर देशकी बात जानने आदिकी सामर्थ्य आ जाती है, क्योंकि जीवात्मा तो पहलेसे सर्वत्र व्याप्त है ही, अन्तःकरण और स्थूलशरीरके सम्बन्धसे ही वह उसके अनुरूप आकारवाला हो रहा है। सम्बन्ध— जीवात्मा तो स्वयंप्रकाशस्वरूप है, उसे मन, बुद्धिके सम्बन्धसे वस्तुका ज्ञान होता है, यह माननेकी क्या आवश्यकता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसंगोऽन्यतरनियमो वान्यथा ॥ २ । ३ । ३२ ॥ अन्यथा=जीवको अन्तःकरणके सम्बन्धसे विषय-ज्ञान होता है; ऐसा
- यह मन्त्र पूर्वसूत्रकी टिप्पणीमें आ गया है।