भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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सूत्र ३२ ] अध्याय २ २२९ न माननेपर; नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसंगः = उसे सदा ही विषयोंके अनुभव होनेका या कभी भी न होनेका प्रसंग उपस्थित होगा; वा = अथवा; अन्यतरनियमः = आत्माकी ग्राहक-शक्ति या विषयकी ग्राह्य-शक्तिके नियमन (प्रतिबन्ध)-की कल्पना करनी पड़ेगी (ऐसी दशामें अन्तःकरणका सम्बन्ध मानना ही युक्तिसंगत है)। व्याख्या—यदि यह नहीं माना जाय कि यह जीवात्मा अन्तःकरणके सम्बन्धसे समस्त वस्तुओंका अनुभव करता है तो प्रत्यक्षमें जो यह देखा जाता है कि यह जीवात्मा कभी किसी वस्तुका अनुभव करता है और कभी नहीं करता, इसकी सिद्धि नहीं होगी; क्योंकि इसको यदि प्रकाशस्वरूप होनेके कारण स्वतः अनुभव करनेवाला मानेंगे, तब तो इसे सदैव एक साथ प्रत्येक वस्तुका ज्ञान रहता है, ऐसा मानना पड़ेगा। यदि इसमें जाननेकी शक्ति स्वाभाविक नहीं मानेंगे तो कभी किसी भी कालमें न जाननेका प्रसंग आ जायगा अथवा दोनोंमेंसे किसी एककी शक्तिका नियमन (संकोच) मानना पड़ेगा। अर्थात् या तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि किसी निमित्तसे जीवात्माकी ग्राहकशक्तिका प्रतिबन्ध होता है या यह मानना पड़ेगा कि विषयकी ग्राह्य-शक्तिमें किसी कारणवश प्रतिबन्ध आ जाता है। प्रतिबन्ध हट जानेपर विषयकी उपलब्धि होती है और उसके रहनेपर विषयोपलब्धि नहीं होती। परंतु यह गौरवपूर्ण कल्पना करनेकी अपेक्षा अन्तःकरणके सम्बन्धको स्वीकार कर लेनेमें ही लाघव है। इसलिये यही मानना ठीक है कि अन्तःकरणके सम्बन्धसे ही जीवात्माको समस्त लौकिक पदार्थोंका अनुभव होता है। ‘मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति’ (बृह० उ० १।५।३) अर्थात् ‘मनसे ही देखता है, मनसे सुनता है’ इत्यादि मन्त्र-वाक्योंद्वारा श्रुति भी अन्तःकरणके सम्बन्धको स्वीकार करती है। जीवात्माका अन्तःकरणसे सम्बन्ध रहते हुए भी वह कभी तो कार्यरूपमें प्रकट रहता है और कभी कारणरूपसे अप्रकट रहता है। इस प्रकार यहाँतक यह बात सिद्ध हो गयी कि जीवात्माको जो अणु कहा