भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 486 में से

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पृष्ठ 234

सूत्र ३४-३५] अध्याय २ २३१

है, स्वरूपसे वह कर्ता नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें उसका स्वरूप निष्क्रिय बताया गया है। (श्वेता० ६।१२) यह बात इस प्रकरणके अन्तमें सिद्ध की गयी है। सम्बन्ध — जीवात्माके कर्ता होनेमें दूसरा हेतु बताया जाता है— विहारोपदेशात् ॥ २। ३। ३४ ॥ विहारोपदेशात् = स्वप्नमें स्वेच्छासे विहार करनेका वर्णन होनेसे भी (यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा 'कर्ता' है)। व्याख्या — शास्त्रके विधि-निषेधके सिवा, यह स्वप्नावस्थामें स्वेच्छापूर्वक घूमना-फिरना, खेल-तमाशा करना आदि कर्म करता है, ऐसा वर्णन है (बृह० उ० ४। ३। १३; २। १। १८) इसलिये भी यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा कर्ता है, जड प्रकृतिमें स्वेच्छापूर्वक कर्म करना नहीं बनता। सम्बन्ध — तीसरा कारण बताते हैं— उपादानात् ॥ २। ३। ३५ ॥ उपादानात् = इन्द्रियोंको ग्रहण करके विचरनेका वर्णन होनेसे (भी यही सिद्ध होता है कि इन्द्रिय आदिके सम्बन्धसे जीवात्मा 'कर्ता' है)। व्याख्या — यहाँ 'उपादान' शब्द उपादान कारणका वाचक नहीं; किंतु 'ग्रहण' रूप क्रियाका बोधक है। श्रुतिमें कहा है— 'स यथा महाराजो जानपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥' (बृह० उ० २। १। १८) अर्थात् 'जिस प्रकार कोई महाराज प्रजाजनोंको साथ लेकर अपने देशमें इच्छानुसार भ्रमण करता है, वैसे ही यह जीवात्मा स्वप्नावस्थामें प्राणशब्दवाच्य इन्द्रियोंको ग्रहण करके इस शरीरमें इच्छानुसार विचरता है। इस प्रकार इन्द्रियोंके द्वारा कर्म करनेका वर्णन होनेसे यह सिद्ध होता है कि प्रकृति या इन्द्रियाँ स्वतन्त्र 'कर्ता' नहीं हैं; उनसे युक्त हुआ जीवात्मा ही कर्ता है (गीता १५। ७, ९)। सम्बन्ध — प्रकारान्तरसे जीवात्माका कर्तापन सिद्ध करते हैं—

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