वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्यपदेशाच्च क्रियायां न चेन्निर्देशविपर्ययः ॥ २ । ३ । ३६ ॥ क्रियायाम् = क्रिया करनेमें; व्यपदेशात् = जीवात्माके कर्तापनका श्रुतिमें कथन है, इसलिये; च = भी (जीवात्मा कर्ता है); चेत् = यदि; न = जीवात्माको कर्ता बताना अभीष्ट न होता तो; निर्देशविपर्ययः = श्रुतिका संकेत उसके विपरीत होता। व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि 'विज्ञानं यज्ञं तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च।' (तै० उ० २।५) अर्थात् 'यह जीवात्मा यज्ञका विस्तार करता है और उसके लिये कर्मोंका विस्तार करता है।' इस प्रकार जीवात्माको कर्मोंका विस्तार करनेवाला कहा जानेके कारण उसका कर्तापन सिद्ध होता है। यदि कहो 'विज्ञान' शब्द बुद्धिका वाचक है, अतः यहाँ बुद्धिको ही कर्ता बताया गया है तो यह कहना उस प्रसंगके विपरीत होगा; क्योंकि वहाँ विज्ञानमयके नामसे जीवात्माका ही प्रकरण है। यदि 'विज्ञान' नामसे बुद्धिको ग्रहण करना अभीष्ट होता तो मन्त्रमें 'विज्ञान' शब्दके साथ प्रथमा विभक्तिका प्रयोग न होकर करणद्योतक तृतीया विभक्तिका प्रयोग होता। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जीव यदि स्वतन्त्र कर्ता है, तब तो इसे अपने हितका ही काम करना चाहिये, अनिष्टकार्यमें इसकी प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये; किंतु ऐसा नहीं देखा जाता, इसका क्या कारण है? इसपर कहते हैं— उपलब्धिवदनियमः ॥ २ । ३ । ३७ ॥ उपलब्धिवत् = सुख-दुःखादि भोगोंकी प्राप्तिकी भाँति; अनियमः = कर्म करनेमें भी नियम नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार इस जीवात्माको सुख-दुःख आदि भोगोंकी प्राप्ति होती है, उसमें यह निश्चित नियम नहीं है कि उसे अनुकूल-ही- अनुकूल भोग प्राप्त हों, प्रतिकूल न हों; इसी प्रकार कर्म करनेमें भी यह नियम नहीं है कि वह अपने हितकारक ही कर्म करे, अहितकारक न करे।