वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३८ ] अध्याय २ २३३ यदि कहो कि फल-भोगमें तो जीव प्रारब्धके कारण स्वतन्त्र नहीं है, उसके प्रारब्धानुसार परमेश्वरके विधानसे जैसे भोगोंका मिलना उचित होता है, वैसे भोग मिलते हैं; परंतु नये कर्मोंके करनेमें तो वह स्वतन्त्र है; फिर अहितकर कर्ममें प्रवृत्त होना कैसे उचित है, तो इसका उत्तर यह है कि वह जिस प्रकार फल भोगनेमें प्रारब्धके अधीन है, वैसे ही नये कर्म करनेमें अनादिकालसे संचित कर्मोंके अनुसार जो जीवात्माका स्वभाव बना हुआ है, उसके अधीन है; इसलिये यह सर्वथा हितमें ही प्रयुक्त हो, ऐसा नियम नहीं हो सकता। अतः कोई विरोध नहीं है। भगवान्का आश्रय लेकर यदि यह प्रभुकी कृपासे मिले हुए विवेकका आदर करे, प्रमाद न करे तो बड़ी सुगमतासे अपने स्वभावका सुधार कर सकता है। उसका पूर्णतया सुधार हो जानेपर अहितकारक कर्मोंमें होनेवाली प्रवृत्ति बंद हो सकती है। सम्बन्ध — उपर्युक्त कथनकी पुष्टिके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— शक्तिविपर्ययात् ॥ २।३।३८ ॥ शक्तिविपर्ययात् = शक्तिका विपर्यय होनेके कारण भी (विवेकका आदर किये बिना उसके द्वारा सर्वथा हिताचरण होनेका नियम नहीं हो सकता)। व्याख्या — जीवात्माका जो कर्तापन है, वह स्वरूपसे नहीं है; किंतु अनादि कर्मसंस्कार तथा इन्द्रियों और शरीर आदिके सम्बन्धसे है यह बात पहले बता आये हैं। इसलिये वह नियमितरूपसे अपने हितका आचरण नहीं कर सकता; क्योंकि प्रत्येक काम करनेमें सहकारी कारणोंकी और बाह्य सामग्रीकी आवश्यकता होती है, उन सबकी उपलब्धिमें यह सर्वथा परतन्त्र है एवं अन्तःकरणकी, इन्द्रियोंकी और शरीरकी शक्ति भी कभी अनुकूल हो जाती है और कभी प्रतिकूल हो जाती है। इस प्रकार शक्तिका विपर्यय होनेके कारण भी विवेकका आदर किये बिना जीवात्मा अपने हितका आचरण करनेमें सर्वथा स्वतन्त्र नहीं है।