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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

२३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्यपदेशाच्च क्रियायां न चेन्निर्देशविपर्ययः ॥ २ । ३ । ३६ ॥ क्रियायाम् = क्रिया करनेमें; व्यपदेशात् = जीवात्माके कर्तापनका श्रुतिमें कथन है, इसलिये; च = भी (जीवात्मा कर्ता है); चेत् = यदि; न = जीवात्माको कर्ता बताना अभीष्ट न होता तो; निर्देशविपर्ययः = श्रुतिका संकेत उसके विपरीत होता। व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि 'विज्ञानं यज्ञं तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च।' (तै० उ० २।५) अर्थात् 'यह जीवात्मा यज्ञका विस्तार करता है और उसके लिये कर्मोंका विस्तार करता है।' इस प्रकार जीवात्माको कर्मोंका विस्तार करनेवाला कहा जानेके कारण उसका कर्तापन सिद्ध होता है। यदि कहो 'विज्ञान' शब्द बुद्धिका वाचक है, अतः यहाँ बुद्धिको ही कर्ता बताया गया है तो यह कहना उस प्रसंगके विपरीत होगा; क्योंकि वहाँ विज्ञानमयके नामसे जीवात्माका ही प्रकरण है। यदि 'विज्ञान' नामसे बुद्धिको ग्रहण करना अभीष्ट होता तो मन्त्रमें 'विज्ञान' शब्दके साथ प्रथमा विभक्तिका प्रयोग न होकर करणद्योतक तृतीया विभक्तिका प्रयोग होता। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जीव यदि स्वतन्त्र कर्ता है, तब तो इसे अपने हितका ही काम करना चाहिये, अनिष्टकार्यमें इसकी प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये; किंतु ऐसा नहीं देखा जाता, इसका क्या कारण है? इसपर कहते हैं— उपलब्धिवदनियमः ॥ २ । ३ । ३७ ॥ उपलब्धिवत् = सुख-दुःखादि भोगोंकी प्राप्तिकी भाँति; अनियमः = कर्म करनेमें भी नियम नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार इस जीवात्माको सुख-दुःख आदि भोगोंकी प्राप्ति होती है, उसमें यह निश्चित नियम नहीं है कि उसे अनुकूल-ही- अनुकूल भोग प्राप्त हों, प्रतिकूल न हों; इसी प्रकार कर्म करनेमें भी यह नियम नहीं है कि वह अपने हितकारक ही कर्म करे, अहितकारक न करे।

सूत्र ३८ ] अध्याय २ २३३

सूत्र ३८ ] अध्याय २ २३३ यदि कहो कि फल-भोगमें तो जीव प्रारब्धके कारण स्वतन्त्र नहीं है, उसके प्रारब्धानुसार परमेश्वरके विधानसे जैसे भोगोंका मिलना उचित होता है, वैसे भोग मिलते हैं; परंतु नये कर्मोंके करनेमें तो वह स्वतन्त्र है; फिर अहितकर कर्ममें प्रवृत्त होना कैसे उचित है, तो इसका उत्तर यह है कि वह जिस प्रकार फल भोगनेमें प्रारब्धके अधीन है, वैसे ही नये कर्म करनेमें अनादिकालसे संचित कर्मोंके अनुसार जो जीवात्माका स्वभाव बना हुआ है, उसके अधीन है; इसलिये यह सर्वथा हितमें ही प्रयुक्त हो, ऐसा नियम नहीं हो सकता। अतः कोई विरोध नहीं है। भगवान्का आश्रय लेकर यदि यह प्रभुकी कृपासे मिले हुए विवेकका आदर करे, प्रमाद न करे तो बड़ी सुगमतासे अपने स्वभावका सुधार कर सकता है। उसका पूर्णतया सुधार हो जानेपर अहितकारक कर्मोंमें होनेवाली प्रवृत्ति बंद हो सकती है। सम्बन्ध — उपर्युक्त कथनकी पुष्टिके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— शक्तिविपर्ययात् ॥ २।३।३८ ॥ शक्तिविपर्ययात् = शक्तिका विपर्यय होनेके कारण भी (विवेकका आदर किये बिना उसके द्वारा सर्वथा हिताचरण होनेका नियम नहीं हो सकता)। व्याख्या — जीवात्माका जो कर्तापन है, वह स्वरूपसे नहीं है; किंतु अनादि कर्मसंस्कार तथा इन्द्रियों और शरीर आदिके सम्बन्धसे है यह बात पहले बता आये हैं। इसलिये वह नियमितरूपसे अपने हितका आचरण नहीं कर सकता; क्योंकि प्रत्येक काम करनेमें सहकारी कारणोंकी और बाह्य सामग्रीकी आवश्यकता होती है, उन सबकी उपलब्धिमें यह सर्वथा परतन्त्र है एवं अन्तःकरणकी, इन्द्रियोंकी और शरीरकी शक्ति भी कभी अनुकूल हो जाती है और कभी प्रतिकूल हो जाती है। इस प्रकार शक्तिका विपर्यय होनेके कारण भी विवेकका आदर किये बिना जीवात्मा अपने हितका आचरण करनेमें सर्वथा स्वतन्त्र नहीं है।

२३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि जीवात्माका कर्तापन उसमें स्वरूपसे ही मान लिया जाय तो क्या हानि है? इसपर कहते हैं— समाध्यभावाच्च ॥ २।३।३९॥ समाध्यभावात्=समाधि-अवस्थाका अभाव प्राप्त होनेसे; च=भी (जीवात्माका कर्तापन स्वाभाविक नहीं मानना चाहिये)। व्याख्या—समाधि-अवस्थामें कर्मोंका सर्वथा अभाव हो जाता है। यदि जीवमें कर्तापन उसका स्वाभाविक धर्म मान लिया जायगा तो समाधि-अवस्थाका होना सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि जिस प्रकार जीवात्मामें चेतनता स्वरूपगत धर्म है, उसी प्रकार यदि कर्म भी हो तो वह कभी भी निष्क्रिय नहीं हो सकता; किंतु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है; जीवात्माका स्वरूप निष्क्रिय माना गया है; (श्वेता० ६।१२) अतः उसमें जो कर्तापन है, वह अनादिसिद्ध अन्तःकरण आदिके सम्बन्धसे है, स्वरूपगत नहीं है। सम्बन्ध—इस बातको दृढ़ करनेके लिये फिर कहा जाता है— यथा च तक्षोभयथा ॥ २।३।४०॥ च=इसके सिवा; यथा=जैसे; तक्षा=कारीगर; उभयथा=कभी कर्म करता है, कभी नहीं करता, ऐसे दो प्रकारकी स्थितिमें देखा जाता है (उसी प्रकार जीवात्मा भी दोनों प्रकारकी स्थितिमें रहता है, इसलिये उसका कर्तापन स्वरूपगत नहीं है)। व्याख्या—जिस प्रकार रथ आदि वस्तुओंको बनानेवाला कारीगर जब अपने सहकारी नाना प्रकारके हथियारोंसे सम्पन्न होकर कार्यमें प्रवृत्त होता है, तब तो वह उस कार्यका कर्ता है और जब हथियारोंको अलग रखकर चुपचाप बैठ जाता है, तब उस क्रियाका कर्ता नहीं है। इस प्रकार यह जीवात्मा भी जब अन्तःकरण और इन्द्रियोंका अधिष्ठाता होता है, तब तो उनके द्वारा किये जानेवाले कर्मोंका वह कर्ता है और जब उनसे सम्बन्ध छोड़ देता है, तब कर्ता नहीं

सूत्र ४० ] अध्याय २ २३५

सूत्र ४० ] अध्याय २ २३५ है। अतः जीवात्माका कर्तापन स्वभावसिद्ध नहीं है। इसके सिवा, यदि जीवात्माको स्वरूपसे कर्ता मान लिया जाय तो श्रीमद्भगवद्गीताका निम्नलिखित वर्णन सर्वथा असंगत ठहरेगा— प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥ 'हे अर्जुन ! वास्तवमें सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये हुए हैं, तो भी जो अहंकारसे मोहित हो गया है वह पुरुष 'मैं कर्ता हूँ' ऐसे मान लेता है।' (गीता ३। २७) नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥ 'हे अर्जुन! तत्त्वको जाननेवाला योगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ; सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखोंको खोलता और मीचता हुआ भी सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थोंमें बर्त रही हैं, इस प्रकार समझता हुआ, निःसंदेह ऐसे माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ।' (गीता ५। ८-९) प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः। यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥ 'जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंको सब प्रकारसे प्रकृतिके ही किये हुए देखता है अर्थात् इस बातको तत्त्वसे समझ लेता है कि प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बर्तते हैं तथा आत्माको अकर्ता देखता है, वही देखता है।' (गीता १३। २९)

२३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ इसी प्रकार भगवद्गीतामें जगह-जगह जीवात्मामें कर्तापनका निषेध किया है, इससे यही सिद्ध होता है कि जीवात्माका कर्तापन अन्तःकरण और संस्कारोंके सम्बन्धसे है, केवल शुद्ध आत्मामें कर्तापन नहीं है। (गीता १८। १६) सम्बन्ध- पूर्वसूत्रोंसे यह निश्चय किया गया कि प्रकृति स्वतन्त्र कर्ता नहीं है तथा जीवात्माका जो कर्तापन है वह भी बुद्धि, मन और इन्द्रिय आदिके सम्बन्धसे है; स्वभावसे नहीं है, इस कारण यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उपर्युक्त जीवात्माका कर्तापन स्वाधीन है या पराधीन, इसपर कहते हैं- परात्तु तच्छ्रुतेः ॥ २ । ३ । ४१ ॥ तत्=वह जीवात्माका कर्तापन; परात्=परमेश्वरसे; तु=ही है; श्रुतेः= क्योंकि श्रुतिके वर्णनसे यही सिद्ध होता है। व्याख्या- बृहदारण्यकमें कहा है कि 'जो जीवात्मामें रहकर उसका नियमन करता है, वह अन्तर्यामी तेरा आत्मा है' (३।७।२२); छान्दोग्यमें कहा है कि 'मैं इस जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर नाम-रूपको प्रकट करूँगा। (६। ३। २) तथा केनोपनिषद्में जो यक्षकी आख्यायिका है, उसमें भी यह सिद्ध किया गया है कि 'अग्नि और वायु आदि देवताओंमें अपना कार्य करनेकी स्वतन्त्र शक्ति नहीं है, उस परब्रह्मसे शक्ति पाकर ही वे अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ होते हैं।' (३।१-१०) इत्यादि। श्रुतियोंके इस वर्णनसे यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा स्वतन्त्रतापूर्वक कुछ भी नहीं कर सकता, वह जो कुछ करता है, परब्रह्म परमेश्वरके सहयोगसे, उसकी दी हुई शक्तिके द्वारा ही करता है। जीवका कर्तापन ईश्वराधीन है, यह बात गीतामें स्पष्ट कही गयी है- ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ 'हे अर्जुन ! शरीररूपी यन्त्रमें आरूढ़ हुए सब प्राणियोंको अपनी मायासे

सूत्र ४२ ] अध्याय २ २३७

सूत्र ४२ ] अध्याय २ २३७ कर्मोंके अनुसार चलाता हुआ ईश्वर सबके हृदयमें निवास करता है।' (१८।६१) विष्णुपुराणमें जहाँ प्रह्लादका प्रसंग आया है, वहाँ प्रह्लादने अपने पितासे कहा है—'पिताजी! वे भगवान् विष्णु केवल मेरे ही हृदयमें नहीं हैं, अपितु समस्त लोकोंको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित हो रहे हैं, वे ही सर्वव्यापी परमेश्वर मुझे और आपके सहित अन्य सब प्राणियोंको भी समस्त चेष्टाओंमें नियुक्त करते हैं।' (विष्णु० १।१७।२६)* इससे भी यह सिद्ध होता है कि जीवात्माका कर्तापन सर्वथा ईश्वराधीन है। यह जो कुछ करता है, उसीकी दी हुई शक्तिसे करता है, तथापि अभिमानवश अपनेको कर्ता मानकर प्राप्त शक्तिका दुरुपयोग करनेके कारण फँस जाता है (गीता ३।२७)। सम्बन्ध— पूर्वसूत्रमें जीवात्माका कर्तापन ईश्वराधीन बताया गया, इसे सुनकर यह जिज्ञासा होती है कि ईश्वर पहले तो जीवोंसे शुभाशुभ कर्म करवाता है और फिर उसका फल-भोग करवाता है, यह माननेसे ईश्वरमें विषमता और निर्दयताका दोष आयेगा, उसका निराकरण कैसे होगा, इसपर कहते हैं— कृतप्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्या- दिभ्यः ॥ २।३।४२ ॥ तु=किंतु; कृतप्रयत्नापेक्षः=ईश्वर जीवके पूर्वकृत कर्म-संस्कारोंकी अपेक्षा रखते हुए ही उसको नवीन कर्म करनेकी शक्ति और सामग्री प्रदान करता है इसलिये तथा; विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः=विधि-निषेध शास्त्रकी सार्थकता आदि हेतुओंसे भी ईश्वर सर्वथा निर्दोष है। व्याख्या—ईश्वरद्वारा जो जीवात्माको नवीन कर्म करनेकी शक्ति और सामग्री दी जाती है, वह उस जीवात्माके जन्म-जन्मान्तरमें संचित किये हुए कर्म-संस्कारोंकी अपेक्षासे ही दी जाती है, बिना अपेक्षाके नहीं तथा उसीके साथ परम सुहृद् प्रभुने उस शक्ति और सामग्रीका सदुपयोग करनेके

  • न केवलं मद्हृदयं स विष्णुराक्रम्य लोकानखिलानवस्थितः । स मां त्वदादींश्च पितः समस्तान् समस्तचेष्टासु युनक्ति सर्वगः ॥

२३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ लिये मनुष्यको विवेक भी प्रदान किया है एवं उस विवेकको जाग्रत् करनेके लिये शास्त्रमें अच्छे कर्मोंका विधान और बुरे कर्मोंका निषेध भी किया है, इससे यह सिद्ध हो जाता है कि अपने स्वभावका सुधार करनेके लिये मनुष्यको प्रभुने पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की है अतः ईश्वर सर्वथा निर्दोष है। भाव यह कि मनुष्य जो कुछ भी कर्म करता है वह ईश्वरके सहयोगसे ही कर सकता है इसलिये वह पराधीन अवश्य है। परंतु प्राप्त शक्ति और सामग्रीका सदुपयोग या दुरुपयोग करनेमें पराधीन नहीं है। इसीलिये शुभाशुभ कर्मोंके फलका दायित्व जीवपर है। इस स्वतन्त्रताको भी यदि वह ईश्वरके समर्पण करके सर्वथा उनपर निर्भर हो जाय तो सहजमें ही कर्मबन्धनसे छूट सकता है। इसी भावको स्पष्ट करनेके लिये इस प्रसंगमें भगवान्ने कहा है कि— तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥ अर्थात्—जिस परमेश्वरने कर्म करनेकी शक्ति-सामग्री प्रदान की है, जो तुम्हारे हृदयमें स्थित है और तुम्हारा प्रेरक है उसीकी सब प्रकारसे शरण ग्रहण करो। उसीकी कृपासे परम शान्ति और निश्चल परम धामको प्राप्त होओगे। (गीता १८।६२) सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि जीवात्मा कर्ता है और परमेश्वर उसको कर्मोंमें नियुक्त करनेवाला है, इससे जीवात्मा और परमात्माका भेद सिद्ध होता है। श्रुतियोंमें भी जगह-जगह भेदका प्रतिपादन किया गया है (श्वेता० उ० ४। ६-७), परंतु कहीं-कहीं अभेदका भी प्रतिपादन है (बृह० उ० ४।४।५) तथा समस्त जगत्का कारण एक परब्रह्म परमेश्वर ही बताया गया है, इससे भी अभेद सिद्ध होता है। अतः उक्त विरोधका निराकरण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्व- मधीयत एके ॥ २।३।४३॥ नानाव्यपदेशात्=श्रुतिमें जीवोंको बहुत और अलग-अलग बताया गया

सूत्र ४३ ] अध्याय २ २३९

सूत्र ४३ ] अध्याय २ २३९ है, इसलिये; च=तथा; अन्यथा=दूसरे प्रकारसे; अपि=भी; (यही सिद्ध होता है कि) अंशः=जीव ईश्वरका अंश है; एके=क्योंकि एक शाखावाले; दाशकितवादित्वम्=ब्रह्मको दाशकितव आदिरूप कहकर; अधीयते=अध्ययन करते हैं। व्याख्या-श्वेताश्वतरोपनिषद् (६। १२-१३)-में कहा है कि- एको वशी निष्क्रियाणां बहूनामेकं बीजं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्। तत् कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ 'बहुत-से निष्क्रिय जीवोंपर शासन करनेवाला जो एक परमेश्वर एक बीज (अपनी प्रकृति)-को अनेक प्रकारसे विस्तृत करता है, उस अपने हृदयमें स्थित परमेश्वरको जो ज्ञानीजन निरन्तर देखते हैं, उन्हींको सदा रहनेवाला सुख मिलता है, दूसरोंको नहीं। जो एक नित्य चेतन परब्रह्म परमेश्वर बहुत-से नित्य चेतन जीवोंके कर्मफलभोगोंका विधान करता है, वही सबका कारण है, उस ज्ञानयोग और कर्मयोगद्वारा प्राप्त किये जानेयोग्य परमदेव परमेश्वरको जानकर जीवात्मा समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है।' इस प्रकार श्रुतिमें जीवोंके नानात्वका प्रतिपादन किया गया है; साथ ही उसको नित्य और चेतन भी कहा गया है और ईश्वरको जगत्का कारण बताया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि जीवगण परमेश्वरके अंश हैं। केवल इतनेसे ही नहीं, प्रकारान्तरसे भी जीवगण ईश्वरके अंश सिद्ध होते हैं; क्योंकि अथर्ववेदकी शाखावालोंके ब्रह्मसूक्तमें यह पाठ है कि 'ब्रह्म दाशा ब्रह्म दासा ब्रह्मैवेमे कितवाः' अर्थात् 'ये केवट ब्रह्म हैं, दास ब्रह्म हैं तथा ये जुआरी भी ब्रह्म ही हैं।' इस प्रकार जीवोंके बहुत्व और ब्रह्मरूपताका भी वर्णन होनेसे यही सिद्ध होता है कि जीव ईश्वरके अंश हैं। यदि जीवोंको परमेश्वरका अंश न मानकर सर्वथा भिन्न तत्त्व माना जाय तो जो पूर्वोक्त श्रुतियोंमें ब्रह्मको

२४० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

जगत्का एकमात्र कारण कहा गया है और उन दाश, कितवोंको ब्रह्म कहा गया है, उस कथनमें विरोध आयेगा, इसलिये सर्वथा भिन्न तत्त्व नहीं माना जा सकता। इसलिये अंश मानना ही युक्तिसंगत है, किंतु जिस प्रकार साकार वस्तुके टुकड़ोंको उसका अंश कहा जाता है, वैसे जीवोंको ईश्वरका अंश नहीं कहा जा सकता; क्योंकि अवयवरहित अखण्ड परमेश्वरके खण्ड नहीं हो सकते। अतएव कार्यकारणभावसे ही जीवोंको परमेश्वरका अंश मानना उचित है तथा वह कार्यकारणभाव भी इसी रूपमें है कि प्रलयकालमें अव्यक्तरूपसे परब्रह्म परमेश्वरमें विलीन रहनेवाले नित्य और चेतन जीव, सृष्टिकालमें उसी परमेश्वरसे प्रकट हो जाते हैं और पुनः संहारके समय उन्हींमें उन जीवोंका लय होता है तथा उनके शरीरोंकी उत्पत्ति भी उस ब्रह्मसे ही होती है। यह बात श्रीमद्भगवद्गीतामें इस प्रकार स्पष्ट की गयी है— मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्। सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ 'हे अर्जुन ! मेरी महत् ब्रह्मरूप प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी माया सम्पूर्ण भूतोंकी योनि है अर्थात् गर्भाधानका स्थान है और मैं उस योनिमें चेतनरूप बीजको स्थापित करता हूँ, उस जड-चेतनके संयोगसे सब भूतोंकी उत्पत्ति होती है। तथा हे अर्जुन ! नाना प्रकारकी सब योनियोंमें जितनी मूर्तियाँ अर्थात् शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी त्रिगुणमयी मेरी प्रकृति तो गर्भको धारण करनेवाली माता है और मैं बीजको स्थापित करनेवाला पिता हूँ।' (गीता १४। ३-४) इसलिये पिता और संतानकी भाँति जीवोंको ईश्वरका अंश मानना ही शास्त्रके कथनानुसार ठीक मालूम होता है और ऐसा होनेसे जीव तथा ब्रह्मका अभेद कहनेवाली श्रुतियोंकी भी सार्थकता हो जाती है। सम्बन्ध—प्रमाणान्तरसे जीवके अंशत्वको सिद्ध करते हैं—

अधिक भी है, समस्त जीवसमुदाय इस परब्रह्मका एक पाद (अंश) है

सूत्र ४४-४५ ] अध्याय २ २४१ मन्त्रवर्णाच्च ॥ २ । ३ । ४४ ॥ मन्त्रवर्णात् = मन्त्रके शब्दोंसे; च = भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—मन्त्रमें कहा है कि पहले जो कुछ वर्णन किया गया है उतना तो इस परब्रह्म परमेश्वरका महत्त्व है ही; वह परमपुरुष उससे अधिक भी है, समस्त जीवसमुदाय इस परब्रह्मका एक पाद (अंश) है और इसके तीन पाद अमृतस्वरूप दिव्य (सर्वथा अलौकिक अपने ही विज्ञानानन्दस्वरूपमें) हैं,* (छा० उ० ३।१२।६)। इस प्रकार मन्त्रके शब्दोंमें स्पष्ट ही समस्त जीवोंको ईश्वरका अंश बताया गया है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि जीवगण परमेश्वरके अंश हैं। सम्बन्ध— उसी बातको स्मृतिप्रमाणसे सिद्ध करते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ २ । ३ । ४५ ॥ अपि=इसके सिवा; स्मर्यते च=(भगवद्गीता आदिमें) यही स्मरण भी किया गया है। व्याख्या—यह बात केवल मन्त्रमें ही नहीं कही गयी है, अपितु गीता (१५।७)-में साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने भी इसका अनुमोदन किया है— ‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।’ ‘इस जीवलोकमें यह जीवसमुदाय मेरा ही अंश है।’ इसी प्रकार दसवें अध्यायमें अपनी मुख्य- मुख्य विभूतियों अर्थात् अंशसमुदायका वर्णन करके अन्त (१०।४२)- में कहा है कि— अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥ ‘अर्जुन! तुझे इस बहुत भेदोंको अलग-अलग जाननेसे क्या प्रयोजन है, तू बस इतना ही समझ ले कि मैं अपनी शक्तिके किसी एक अंशसे इस

  • यह मन्त्र पहले पृष्ठ ४० में आ गया है।

समस्त जगत्‌को भलीभाँति धारण किये हुए स्थित हूँ।' दूसरी जगह भी ऐसा ही वर्णन आता है—'हे मैत्रेय ! एक पुरुष जीवात्मा जो कि अविनाशी, शुद्ध, नित्य और सर्वव्यापी है, वह भी सर्व-भूतमय विज्ञानानन्दघन परमात्माका अंश ही है।'* इस प्रकार स्मृतियोंद्वारा समर्थन किया जानेसे भी यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा परमेश्वरका अंश है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि जीवात्मा ईश्वरका ही अंश है तब तो जीवके शुभाशुभ कर्मोंसे और सुख-दुःखादि भोगोंसे ईश्वरका भी सम्बन्ध होता होगा, इसपर कहते हैं— प्रकाशादिवन्नैवं परः ॥ २।३।४६ ॥ परः = परमेश्वर; एवम्‌=इस प्रकार जीवात्माके दोषोंसे सम्बद्ध; न = नहीं होता; प्रकाशादिवत्‌=जिस प्रकार कि प्रकाश आदि अपने अंशके दोषोंसे लिप्त नहीं होते। व्याख्या—जिस प्रकार प्रकाश सूर्य तथा आकाश आदि भी अपने अंश इन्द्रिय आदिके दोषोंसे लिप्त नहीं होते, वैसे ही ईश्वर भी जीवोंके शुभाशुभ कर्मफलरूप सुख-दुःखादि दोषोंसे लिप्त नहीं होता। श्रुतिमें कहा है— सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ 'जिस प्रकार समस्त लोकोंके चक्षुःस्वरूप सूर्यदेव चक्षुमें होनेवाले दोषोंसे लिप्त नहीं होता, वैसे ही समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा अद्वितीय परमेश्वर लोकोंके दुःखोंसे लिप्त नहीं होता।' (क० उ० २।२।११) सम्बन्ध—इसी बातको स्मृतिप्रमाणसे पुष्ट करते हैं—

  • एकः शुद्धोऽक्षरो नित्यः सर्वव्यापी तथा पुमान्। सोऽप्यंशः सर्वभूतस्य मैत्रेय परमात्मनः ॥ (वि० पु० ६।४।३६)

सूत्र ४७-४८ ] अध्याय २ २४३

सूत्र ४७-४८ ] अध्याय २ २४३ स्मरन्ति च ॥ २ । ३ । ४७ ॥ स्मरन्ति = यही बात स्मृतिकार कहते हैं; च = और ( श्रुतिमें भी कही गयी है।) व्याख्या — श्रीमद्भगवद्गीतादिमें भी ऐसा ही वर्णन मिलता है— अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ 'अर्जुन ! यह अविनाशी परमात्मा अनादि और गुणातीत होनेके कारण शरीरमें स्थित हुआ भी न तो स्वयं कर्ता है और न सुख-दुःखादि फलोंसे लिप्त ही होता है।' (गीता १३।३१) इसी प्रकार दूसरी जगह भी कहा है कि उन दोनोंमें जो परमात्मा नित्य और निर्गुण कहा गया है, वह जिस प्रकार कमलका पत्ता जलमें रहता हुआ जलसे लिप्त नहीं होता, वैसे ही वह जीवके कर्मफलोंसे लिप्त नहीं होता।' (महाभारत, शान्तिपर्व ३५१ । १४-१५) इसी प्रकार श्रुतिमें भी कहा है कि 'उन दोनोंमेंसे एक जीवात्मा तो पीपलके फलोंको अर्थात् कर्मफलरूप सुख-दुःखोंको भोगता है और परमेश्वर न भोगता हुआ देखता रहता है।'* (मु० उ० ३ । १ । १) इससे भी यही सिद्ध होता है कि परमात्मा किसी प्रकारके दोषोंसे लिप्त नहीं होता। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'जब सभी जीव एक ही परमेश्वरके अंश हैं तब किसी एकके लिये जिस कामको करनेकी आज्ञा दी जाती है, दूसरेके लिये उसीका निषेध क्यों किया जाता है? शास्त्रमें जीवोंके लिये भिन्न-भिन्न आदेश दिये जानेका क्या कारण है?' इसपर कहते हैं— अनुज्ञापरिहारौ देहसम्बन्धाज्ज्योतिरादिवत् ॥ २ । ३ । ४८ ॥ अनुज्ञापरिहारौ =विधि और निषेध; ज्योतिरादिवत् =ज्योति आदिकी भाँति; देहसम्बन्धात्=शरीरोंके सम्बन्धसे हैं। व्याख्या — भिन्न-भिन्न प्रकारके शरीरोंके साथ जीवात्माओंका सम्बन्ध

  • यह मन्त्र सूत्र १।३।७ की व्याख्यामें आया है।

२४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ होनेसे उनके लिये अनुज्ञा और निषेधका भेद अनुचित नहीं है। जैसे, श्मशानकी अग्निको त्याज्य और यज्ञकी अग्निको ग्राह्य बताया जाता है तथा जैसे शूद्रको सेवा करनेके लिये आज्ञा दी है और ब्राह्मणके लिये सेवा-वृत्तिका निषेध किया गया है; इसी प्रकार सभी जगह समझ लेना चाहिये। शरीरोंके सम्बन्धसे यथायोग्य भिन्न-भिन्न प्रकारका विधि-निषेधरूप आदेश उचित ही है, इसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उक्त प्रकारसे विधि-निषेधकी व्यवस्था होनेपर भी जीवात्माओंको विभु माननेसे उनका और कर्मोंका अलग-अलग विभाग कैसे होगा? इसपर कहते हैं— असंततेश्चाव्यतिकरः ॥ २ । ३ । ४९ ॥ च=इसके सिवा; असंततेः=(शरीरोंके आवरणसे) व्यापकताका निरोध होनेके कारण; अव्यतिकरः=उनका तथा उनके कर्मोंका मिश्रण नहीं होगा। व्याख्या—जिस प्रकार कारणशरीरका आवरण होनेसे सब जीवात्मा विभु होते हुए भी प्रलयकालमें एक नहीं हो जाते, उनका विभाग विद्यमान रहता है (ब्र० सू० २।३।३०) वैसे ही सृष्टिकालमें शरीरोंके सम्बन्धसे सब जीवोंकी परस्पर व्याप्ति न होनेके कारण उनके कर्मोंका मिश्रण नहीं होता, विभाग बना रहता है; क्योंकि शरीर, अन्तःकरण और अनादि कर्मसंस्कार आदिके सम्बन्धसे उनकी व्यापकता परमेश्वरकी भाँति नहीं है, किंतु सीमित है। अतएव जिस प्रकार शब्दमात्रकी आकाशमें व्याप्ति होते हुए भी प्रत्येक शब्दका परस्पर मिश्रण नहीं होता, उनकी भिन्नता बनी रहती है तभी तो एक ही कालमें भिन्न-भिन्न देशोंमें बोले हुए शब्दोंको भिन्न-भिन्न स्थानोंमें भिन्न-भिन्न मनुष्य रेडियोद्वारा अलग-अलग सुन सकते हैं, इसमें कोई अड़चन नहीं आती। उन शब्दोंका विभुत्व और अमिश्रण दोनों रह सकते हैं, वैसे ही आत्माओंका भी विभुत्व उनके अमिश्रणमें बाधक नहीं है; क्योंकि आत्मतत्त्व तो शब्दकी अपेक्षा अत्यन्त सूक्ष्म है, उसके विभु होते हुए परस्पर मिश्रण न होनेमें तो कहना ही क्या है!

सूत्र ५०-५१ ] अध्याय २ २४५ सम्बन्ध— यहाँतक जीवात्मा परमात्माका अंश है तथा वह नित्य और विभु है, इस सिद्धान्तका श्रुति-स्मृतियोंके प्रमाणसे और युक्तियोंद्वारा भी भलीभाँति प्रतिपादन किया गया तथा अंशांशिभावके कारण अभेदप्रतिपादक श्रुतियोंकी भी सार्थकता सिद्ध की गयी। अब जो लोग जीवात्माका स्वरूप अन्य प्रकारसे मानते हैं, उनकी वह मान्यता ठीक नहीं है; इस बातको सिद्ध करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— आभासा एव च॥ २।३।५०॥ च=इसके सिवा; (अन्य प्रकारकी मान्यताके समर्थनमें दिये जानेवाले युक्तिप्रमाण) आभासाः=आभासमात्र; एव=ही हैं। व्याख्या—जो लोग जीवात्माको उस परब्रह्मका अंश नहीं मानते, सब जीवोंको अलग-अलग स्वतन्त्र मानते हैं, उन्होंने अपनी मान्यताको सिद्ध करनेके लिये जो युक्ति-प्रमाण दिये हैं, वे सब-के-सब आभासमात्र हैं; अतः उनका कथन ठीक नहीं है। जीवात्माओंको परमात्माका अंश मानना ही युक्तिसंगत है; क्योंकि ऐसा माननेपर ही समस्त श्रुतियोंके वर्णनकी एकवाक्यता हो सकती है। सम्बन्ध— परब्रह्म परमेश्वरको श्रुतिमें अखण्ड और अवयवरहित बताया गया है, इसलिये उसका अंश नहीं हो सकता। फिर भी जो जीवोंको उस परमात्माका अंश कहा जाता है, वह अंशांशिभाव वास्तविक नहीं है; घटाकाशकी भाँति उपाधिके निमित्तसे प्रतीत होता है, ऐसा माना जाय तो क्या आपत्ति है? अदृष्टानियमात् ॥ २।३।५१॥ अदृष्टानियमात्=अदृष्ट अर्थात् जन्मान्तरमें किये हुए कर्मफलभोगकी कोई नियत व्यवस्था नहीं हो सकेगी; इसलिये (उपाधिके निमित्तसे जीवोंको परमात्माका अंश मानना युक्तिसंगत नहीं है)। व्याख्या—जीवोंको परमात्माका अंश न मानकर अलग-अलग स्वतन्त्र माननेसे तथा घटाकाशकी भाँति उपाधिके निमित्तसे जीवगणको परमात्माका अंश माननेसे भी जीवोंके कर्मफल-भोगकी व्यवस्था नहीं हो सकेगी; क्योंकि

२४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ यदि जीवोंको अलग-अलग स्वतन्त्र मानते हैं तो उनके कर्मफल-भोगकी व्यवस्था कौन करेगा। जीवात्मा स्वयं अपने कर्मोंका विभाग करके ऐसा नियम बना ले कि अमुक कर्मका अमुक फल मुझे अमुक प्रकारसे भोगना है तो यह सम्भव नहीं है। कर्म जड हैं, अतः वे भी अपने फलका भोग करानेकी व्यवस्था स्वयं नहीं कर सकते। यदि ऐसा मानें कि एक ही परमात्मा घटाकाशकी भाँति अनादिसिद्ध शरीरादिकी उपाधियोंके निमित्तसे नाना जीवोंके रूपमें प्रतीत हो रहा है; तो भी उन जीवोंके कर्मफलभोगकी व्यवस्था नहीं हो सकती; क्योंकि इस मान्यताके अनुसार जीवात्मा और परमात्माका भेद वास्तविक न होनेके कारण समस्त जीवोंके कर्मोंका विभाग करना, उनके भोगनेवाले जीवोंका विभाग करना तथा परमात्माको उन सबसे अलग रहकर उनके कर्मफलोंका व्यवस्थापक मानना सम्भव न होगा। अतः श्रुतिके कथनानुसार यही मानना ठीक है कि सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वर ही सबके कर्मफलोंकी यथायोग्य व्यवस्था करता है तथा सब जीव उसीसे प्रकट होते हैं, इसलिये पिता- पुत्रकी भाँति उसके अंश हैं। सम्बन्ध - केवल कर्मफलभोगमें ही नहीं, संकल्प आदिमें भी उसी दोषकी प्राप्ति दिखाते हैं— अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम् ॥ २।३।५२ ॥ च = इसके सिवा; एवम् = इसी प्रकार; अभिसन्ध्यादिषु = संकल्प आदिमें; अपि = भी (अव्यवस्था होगी)। व्याख्या - ईश्वर तथा जीवोंका अंशांशिभाव वास्तविक नहीं, घटाकाशकी भाँति उपाधिके निमित्तसे प्रतीत होनेवाला है; यह माननेपर जिस प्रकार पूर्वसूत्रमें जीवोंके कर्मफल-भोगकी नियमित व्यवस्था न हो सकनेका दोष दिखाया गया है, उसी प्रकार उन जीवोंके संकल्प और इच्छा आदिके विभागकी नियमित व्यवस्था होनेमें भी बाधा पड़ेगी; क्योंकि उन सबके संकल्प आदि परस्पर अलग नहीं रह सकेंगे और परमात्माके संकल्प

आदिसे भी उनका भेद सिद्ध नहीं हो सकेगा। अतः शास्त्रमें जो परब्रह्म परमेश्वरके द्वारा ईक्षण (संकल्प)-पूर्वक जगत्की उत्पत्ति करनेका वर्णन है, उसकी भी संगति नहीं बैठेगी।

प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात् ॥ २ । ३ । ५३ ॥

चेत् = यदि कहो; प्रदेशात् = उपाधियोंमें देशभेद होनेसे (सब व्यवस्था हो जायगी); इति न = तो यह नहीं हो सकता; अन्तर्भावात् = क्योंकि सभी देशोंका उपाधिमें और उपाधियोंका सब देशोंमें अन्तर्भाव है। व्याख्या—यदि कहो, उपाधियोंमें देशका भेद होनेसे सब जीवोंका अलग-अलग विभाग हो जायगा और उसीसे कर्मफल-भोग एवं संकल्प आदिकी भी व्यवस्था हो जायगी, तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि सर्वव्यापी परब्रह्म परमेश्वर सभी उपाधियोंमें व्याप्त है। उपाधियोंके देशभेदसे परमात्माके देशमें भेद नहीं हो सकता। प्रत्येक उपाधिका सम्बन्ध सब देशोंसे हो सकता है। उपाधि एक जगहसे दूसरी जगह जाय तो उसके साथ आकाश नहीं आता-जाता है। जब जिस देशमें उपाधि रहती है, उस समय वहाँका आकाश उसमें आ जाता है। इस प्रकार समस्त आकाशके प्रदेशका सब उपाधियोंमें अन्तर्भाव होगा। इसी तरह समस्त उपाधियोंका भी आकाशमें अन्तर्भाव होगा। किसी प्रकारसे कोई विभाग सिद्ध नहीं हो सकेगा। इसलिये परब्रह्म परमेश्वर और जीवात्माओंका अंशांशिभाव घटाकाशकी भाँति उपाधिनिमित्तक नहीं माना जा सकता।*

तीसरा पाद सम्पूर्ण

  • इसका विस्तार सूत्र ३ । ३ । ३५ से ३ । ३ । ४१ की व्याख्यामें पढ़ना चाहिये।

चौथा पाद

चौथा पाद **सम्बन्ध—**इसके पूर्व तीसरे पादमें पाँच भूतों तथा अन्तःकरणकी उत्पत्तिका प्रतिपादन किया गया और गौणरूपसे जीवात्माकी उत्पत्ति भी बतायी गयी। साथ ही प्रसंगवश जीवात्माके स्वरूपका भी विवेचन किया गया। किंतु वहाँ इन्द्रियोंकी और प्राणकी उत्पत्तिका प्रतिपादन नहीं हुआ, इसलिये उनकी उत्पत्तिका विचारपूर्वक प्रतिपादन करनेके लिये तथा तद्विषयक श्रुतियोंमें प्रतीत होनेवाले विरोधका निराकरण करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया जाता है। श्रुतिमें कहीं तो प्राण और इन्द्रियोंकी उत्पत्ति स्पष्ट शब्दोंमें परमेश्वरसे बतायी है (मु० उ० २।१।३; प्र० उ० ६।४), कहीं अग्नि, जल और पृथिवीसे उनका उत्पन्न होना बताया गया है (छा० उ० ६। ६।२ से ५) तथा कहीं आकाश आदिके क्रमसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन है, वहाँ इन प्राण और इन्द्रिय आदिका नामतक नहीं आया है (तै० उ० २।१) और कहीं तत्त्वोंकी उत्पत्तिके पहले ही इनका होना माना है (शतपथब्रा० ६।१।१।१) उससे इनकी उत्पत्तिका निषेध प्रतीत होता है। इसलिये श्रुतिवाक्योंमें प्रतीत होनेवाले विरोधका निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं— तथा प्राणाः ॥ २।४।१ ॥ तथा = उसी प्रकार; प्राणाः = प्राणशब्दवाच्य इन्द्रियाँ भी (परमेश्वरसे ही उत्पन्न होती हैं)। **व्याख्या—**जिस प्रकार आकाशादि पाँचों तत्त्व तथा अन्य सब परब्रह्म परमेश्वरसे उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार समस्त इन्द्रियाँ भी उसी परमेश्वरसे उत्पन्न होती हैं; क्योंकि उन आकाश आदिकी और इन्द्रियोंकी उत्पत्तिमें किसी प्रकारका भेद नहीं है। श्रुति स्पष्ट कहती है कि 'इस परब्रह्म परमेश्वरसे ही प्राण, मन, समस्त इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, ज्योति, जल और सबको धारण

सूत्र २ ] अध्याय २ २४९

सूत्र २ ] अध्याय २ २४९ करनेवाली पृथिवी उत्पन्न होती है।'* (मु० उ० २।१।३) इस प्रकार इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका श्रुतिमें वर्णन होनेसे यही सिद्ध होता है कि इन्द्रियाँ भी उस परमेश्वरसे ही उत्पन्न होती हैं। सम्बन्ध— जहाँ पहले तेज, जल और पृथिवीकी उत्पत्ति बताते हुए जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया गया है, वहाँ स्पष्ट कहा है कि 'वाणी तेजोमयी है अर्थात् वाक् इन्द्रिय तेजसे उत्पन्न हुई है; इसलिये तेजसे ओतप्रोत है।' इससे तो पाँचों भूतोंसे ही इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका होना सिद्ध होता है जैसा कि दूसरे मतवाले मानते हैं। इस परिस्थितिमें दोनों श्रुतियोंकी एकता कैसे होगी ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— गौण्यसम्भवात् ॥ २।४।२ ॥ असम्भवात् = सम्भव न होनेके कारण वह श्रुति; गौणी = गौणी है अर्थात् उसका कथन गौणरूपसे है। व्याख्या—उस श्रुतिमें कहा गया है कि 'भक्षण किये हुए तेजका जो सूक्ष्म अंश है, वह एकत्र होकर वाणी बनता है।' (छा० उ० ६।६।४) इससे यह सिद्ध होता है कि तैजस पदार्थका सूक्ष्म अंश वाणीको बलवान् बनाता है; क्योंकि श्रुतिने खाये हुए तैजस पदार्थोंके सूक्ष्मांशका ही ऐसा परिणाम बताया है, इसलिये जिसके द्वारा यह खाया जाय, उस इन्द्रियका तैजस तत्त्वसे पहले ही उत्पन्न होना सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार वहाँ खाये हुए अन्नसे मनकी और पीये हुए जलसे प्राणोंकी उत्पत्ति बतायी गयी है। परंतु प्राणोंके बिना जलका पीना ही सिद्ध नहीं होगा। फिर उससे प्राणोंकी उत्पत्ति कैसे सिद्ध होगी? अतः जैसे प्राणोंका उपकारी होनेसे जलको गौणरूपसे प्राणोंकी उत्पत्तिका हेतु कहा गया है, वैसे ही वाक्-इन्द्रियका उपकारी होनेसे तैजस पदार्थोंको वाक्-इन्द्रियकी उत्पत्तिका हेतु गौणरूपसे ही कहा गया है। इसलिये वह श्रुति गौणी है, अर्थात् उसके द्वारा तेज आदि तत्त्वोंसे वाक् आदि

  • यह मन्त्र पृष्ठ २१५ की टिप्पणीमें आ गया है।

२५० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका कथन गौण है; यही मानना ठीक है और ऐसा मान लेनेपर श्रुतियोंके वर्णनमें कोई विरोध नहीं रह जाता है। सम्बन्ध— प्रकारान्तरसे उस श्रुतिका गौणत्व सिद्ध करते हैं— तत्प्राक्छुतेश्च ॥ २ । ४ । ३ ॥ तत्प्राक्छुतेः= श्रुतिके द्वारा उन आकाशादि तत्त्वोंके पहले इन्द्रियोंकी उत्पत्ति कही गयी है, इसलिये; च=भी (तेज आदिसे वाक् आदि इन्द्रियकी उत्पत्ति कहनेवाली श्रुति गौण है)। व्याख्या—शतपथ-ब्राह्मणमें ऋषियोंके नामसे इन्द्रियोंका पाँच तत्त्वोंकी उत्पत्तिसे पहले होना कहा गया है (६। १। १। १) तथा मुण्डकोपनिषद्में भी इन्द्रियोंकी उत्पत्ति पाँच भूतोंसे पहले बतायी गयी है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि आकाशादि तत्त्वोंसे इन्द्रियोंकी उत्पत्ति नहीं हुई है, अतः तेज आदि तत्त्वोंसे वाक् आदिकी उत्पत्ति सूचित करनेवाली वह श्रुति गौण है। सम्बन्ध— अब दूसरी युक्ति देकर उक्त बातकी ही पुष्टि करते हैं— तत्पूर्वकत्वाद्वाचः ॥ २ । ४ । ४ ॥ वाचः=वाणीकी उत्पत्तिका वर्णन; तत्पूर्वकत्वात्=तीनों तत्त्वोंमें उस ब्रह्मके प्रविष्ट होनेके बाद है (इसलिये तेजसे उसकी उत्पत्ति सूचित करनेवाली श्रुति गौण है)। व्याख्या—उस प्रकरणमें यह कहा गया है कि 'उन तीन तत्त्वरूप देवताओंमें जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर उस ब्रह्मने नामरूपात्मक जगत्की रचना की।' (छा० उ० ६। ३। ३) इस प्रकार वहाँ जगत्की उत्पत्ति ब्रह्मके प्रवेशपूर्वक बतायी गयी है; इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि समस्त इन्द्रियोंकी उत्पत्ति ब्रह्मसे ही हुई है, तेज आदि तत्त्वोंसे नहीं। अतः तेज- तत्त्वसे वाणीकी उत्पत्ति सूचित करनेवाली श्रुतिका कथन गौण है। सम्बन्ध—इस प्रकार इन्द्रियोंकी उत्पत्ति भी उस ब्रह्मसे ही होती है

सूत्र ५-६ ] अध्याय २ २५१ और वह पाँच तत्त्वोंसे पहले ही हो जाती है; यह सिद्ध किया गया। अब जो श्रुतियोंमें कहीं तो प्राणोंके नामसे सात इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका वर्णन किया गया है (मु० उ० २।१।८) तथा कहीं मनसहित ग्यारह इन्द्रियोंका वर्णन है (बृह० उ० ३।९।४) इनमेंसे कौन-सा वर्णन ठीक है, उसका निर्णय करनेके लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना करते हुए प्रकरण आरम्भ करते हैं— सप्त गतेर्विशेषितत्वाच्च ॥ २।४।५॥ सप्त = इन्द्रियाँ सात हैं; गतेः = क्योंकि सात ही ज्ञात होती हैं; च = तथा; विशेषितत्वात् = 'सप्त प्राणाः' = कहकर श्रुतिने 'सप्त' पदका प्राणों (इन्द्रियों)- के विशेषणरूपसे प्रयोग किया है। व्याख्या—पूर्वपक्षीका कथन है कि मुख्यतः सात इन्द्रियाँ ही ज्ञात होती हैं और श्रुतिने 'जिनमें सात प्राण अर्थात् आँख, कान, नाक, रसना, त्वचा, वाक् और मन—ये सात इन्द्रियाँ विचरती हैं, वे लोक सात हैं।'* (मु० उ० २।१।८)। ऐसा कहकर इन्द्रियोंका 'सात' यह विशेषण दिया है। इससे यही सिद्ध होता है कि इन्द्रियाँ सात ही हैं। सम्बन्ध— अब सिद्धान्तीकी ओरसे उत्तर दिया जाता है— हस्तादयस्तु स्थितेऽतो नैवम् ॥ २।४।६॥ तु = किंतु; हस्तादयः = हाथ आदि अन्य इन्द्रियाँ भी हैं; अतः = इसलिये; स्थिते = इस स्थितिमें; एवम् = ऐसा; न = नहीं; (कहना चाहिये कि इन्द्रियाँ सात ही हैं।) व्याख्या—हाथ आदि (हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा) अन्य चार इन्द्रियोंका वर्णन भी पूर्वोक्त सात इन्द्रियोंके साथ-साथ दूसरी श्रुतियोंमें स्पष्ट आता है (प्र० उ० ४।८) तथा प्रत्येक मनुष्यके कार्यमें करणरूपसे हस्त आदि चारों इन्द्रियोंका प्रयोग प्रत्यक्ष उपलब्ध है; इसलिये यह नहीं कहा जा सकता

  • सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥