भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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सूत्र ४२ ] अध्याय २ २३७ कर्मोंके अनुसार चलाता हुआ ईश्वर सबके हृदयमें निवास करता है।' (१८।६१) विष्णुपुराणमें जहाँ प्रह्लादका प्रसंग आया है, वहाँ प्रह्लादने अपने पितासे कहा है—'पिताजी! वे भगवान् विष्णु केवल मेरे ही हृदयमें नहीं हैं, अपितु समस्त लोकोंको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित हो रहे हैं, वे ही सर्वव्यापी परमेश्वर मुझे और आपके सहित अन्य सब प्राणियोंको भी समस्त चेष्टाओंमें नियुक्त करते हैं।' (विष्णु० १।१७।२६)* इससे भी यह सिद्ध होता है कि जीवात्माका कर्तापन सर्वथा ईश्वराधीन है। यह जो कुछ करता है, उसीकी दी हुई शक्तिसे करता है, तथापि अभिमानवश अपनेको कर्ता मानकर प्राप्त शक्तिका दुरुपयोग करनेके कारण फँस जाता है (गीता ३।२७)। सम्बन्ध— पूर्वसूत्रमें जीवात्माका कर्तापन ईश्वराधीन बताया गया, इसे सुनकर यह जिज्ञासा होती है कि ईश्वर पहले तो जीवोंसे शुभाशुभ कर्म करवाता है और फिर उसका फल-भोग करवाता है, यह माननेसे ईश्वरमें विषमता और निर्दयताका दोष आयेगा, उसका निराकरण कैसे होगा, इसपर कहते हैं— कृतप्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्या- दिभ्यः ॥ २।३।४२ ॥ तु=किंतु; कृतप्रयत्नापेक्षः=ईश्वर जीवके पूर्वकृत कर्म-संस्कारोंकी अपेक्षा रखते हुए ही उसको नवीन कर्म करनेकी शक्ति और सामग्री प्रदान करता है इसलिये तथा; विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः=विधि-निषेध शास्त्रकी सार्थकता आदि हेतुओंसे भी ईश्वर सर्वथा निर्दोष है। व्याख्या—ईश्वरद्वारा जो जीवात्माको नवीन कर्म करनेकी शक्ति और सामग्री दी जाती है, वह उस जीवात्माके जन्म-जन्मान्तरमें संचित किये हुए कर्म-संस्कारोंकी अपेक्षासे ही दी जाती है, बिना अपेक्षाके नहीं तथा उसीके साथ परम सुहृद् प्रभुने उस शक्ति और सामग्रीका सदुपयोग करनेके

  • न केवलं मद्हृदयं स विष्णुराक्रम्य लोकानखिलानवस्थितः । स मां त्वदादींश्च पितः समस्तान् समस्तचेष्टासु युनक्ति सर्वगः ॥