भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 486 में से

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२३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ लिये मनुष्यको विवेक भी प्रदान किया है एवं उस विवेकको जाग्रत् करनेके लिये शास्त्रमें अच्छे कर्मोंका विधान और बुरे कर्मोंका निषेध भी किया है, इससे यह सिद्ध हो जाता है कि अपने स्वभावका सुधार करनेके लिये मनुष्यको प्रभुने पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की है अतः ईश्वर सर्वथा निर्दोष है। भाव यह कि मनुष्य जो कुछ भी कर्म करता है वह ईश्वरके सहयोगसे ही कर सकता है इसलिये वह पराधीन अवश्य है। परंतु प्राप्त शक्ति और सामग्रीका सदुपयोग या दुरुपयोग करनेमें पराधीन नहीं है। इसीलिये शुभाशुभ कर्मोंके फलका दायित्व जीवपर है। इस स्वतन्त्रताको भी यदि वह ईश्वरके समर्पण करके सर्वथा उनपर निर्भर हो जाय तो सहजमें ही कर्मबन्धनसे छूट सकता है। इसी भावको स्पष्ट करनेके लिये इस प्रसंगमें भगवान्ने कहा है कि— तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥ अर्थात्—जिस परमेश्वरने कर्म करनेकी शक्ति-सामग्री प्रदान की है, जो तुम्हारे हृदयमें स्थित है और तुम्हारा प्रेरक है उसीकी सब प्रकारसे शरण ग्रहण करो। उसीकी कृपासे परम शान्ति और निश्चल परम धामको प्राप्त होओगे। (गीता १८।६२) सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि जीवात्मा कर्ता है और परमेश्वर उसको कर्मोंमें नियुक्त करनेवाला है, इससे जीवात्मा और परमात्माका भेद सिद्ध होता है। श्रुतियोंमें भी जगह-जगह भेदका प्रतिपादन किया गया है (श्वेता० उ० ४। ६-७), परंतु कहीं-कहीं अभेदका भी प्रतिपादन है (बृह० उ० ४।४।५) तथा समस्त जगत्का कारण एक परब्रह्म परमेश्वर ही बताया गया है, इससे भी अभेद सिद्ध होता है। अतः उक्त विरोधका निराकरण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्व- मधीयत एके ॥ २।३।४३॥ नानाव्यपदेशात्=श्रुतिमें जीवोंको बहुत और अलग-अलग बताया गया

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