वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ इसी प्रकार भगवद्गीतामें जगह-जगह जीवात्मामें कर्तापनका निषेध किया है, इससे यही सिद्ध होता है कि जीवात्माका कर्तापन अन्तःकरण और संस्कारोंके सम्बन्धसे है, केवल शुद्ध आत्मामें कर्तापन नहीं है। (गीता १८। १६) सम्बन्ध- पूर्वसूत्रोंसे यह निश्चय किया गया कि प्रकृति स्वतन्त्र कर्ता नहीं है तथा जीवात्माका जो कर्तापन है वह भी बुद्धि, मन और इन्द्रिय आदिके सम्बन्धसे है; स्वभावसे नहीं है, इस कारण यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उपर्युक्त जीवात्माका कर्तापन स्वाधीन है या पराधीन, इसपर कहते हैं- परात्तु तच्छ्रुतेः ॥ २ । ३ । ४१ ॥ तत्=वह जीवात्माका कर्तापन; परात्=परमेश्वरसे; तु=ही है; श्रुतेः= क्योंकि श्रुतिके वर्णनसे यही सिद्ध होता है। व्याख्या- बृहदारण्यकमें कहा है कि 'जो जीवात्मामें रहकर उसका नियमन करता है, वह अन्तर्यामी तेरा आत्मा है' (३।७।२२); छान्दोग्यमें कहा है कि 'मैं इस जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर नाम-रूपको प्रकट करूँगा। (६। ३। २) तथा केनोपनिषद्में जो यक्षकी आख्यायिका है, उसमें भी यह सिद्ध किया गया है कि 'अग्नि और वायु आदि देवताओंमें अपना कार्य करनेकी स्वतन्त्र शक्ति नहीं है, उस परब्रह्मसे शक्ति पाकर ही वे अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ होते हैं।' (३।१-१०) इत्यादि। श्रुतियोंके इस वर्णनसे यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा स्वतन्त्रतापूर्वक कुछ भी नहीं कर सकता, वह जो कुछ करता है, परब्रह्म परमेश्वरके सहयोगसे, उसकी दी हुई शक्तिके द्वारा ही करता है। जीवका कर्तापन ईश्वराधीन है, यह बात गीतामें स्पष्ट कही गयी है- ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ 'हे अर्जुन ! शरीररूपी यन्त्रमें आरूढ़ हुए सब प्राणियोंको अपनी मायासे