भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 486 में से

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पृष्ठ 238

सूत्र ४० ] अध्याय २ २३५ है। अतः जीवात्माका कर्तापन स्वभावसिद्ध नहीं है। इसके सिवा, यदि जीवात्माको स्वरूपसे कर्ता मान लिया जाय तो श्रीमद्भगवद्गीताका निम्नलिखित वर्णन सर्वथा असंगत ठहरेगा— प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥ 'हे अर्जुन ! वास्तवमें सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये हुए हैं, तो भी जो अहंकारसे मोहित हो गया है वह पुरुष 'मैं कर्ता हूँ' ऐसे मान लेता है।' (गीता ३। २७) नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥ 'हे अर्जुन! तत्त्वको जाननेवाला योगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ; सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखोंको खोलता और मीचता हुआ भी सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थोंमें बर्त रही हैं, इस प्रकार समझता हुआ, निःसंदेह ऐसे माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ।' (गीता ५। ८-९) प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः। यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥ 'जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंको सब प्रकारसे प्रकृतिके ही किये हुए देखता है अर्थात् इस बातको तत्त्वसे समझ लेता है कि प्रकृतिसे उत्पन्न हुए सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बर्तते हैं तथा आत्माको अकर्ता देखता है, वही देखता है।' (गीता १३। २९)