वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 254, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ५-६ ] अध्याय २ २५१ और वह पाँच तत्त्वोंसे पहले ही हो जाती है; यह सिद्ध किया गया। अब जो श्रुतियोंमें कहीं तो प्राणोंके नामसे सात इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका वर्णन किया गया है (मु० उ० २।१।८) तथा कहीं मनसहित ग्यारह इन्द्रियोंका वर्णन है (बृह० उ० ३।९।४) इनमेंसे कौन-सा वर्णन ठीक है, उसका निर्णय करनेके लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना करते हुए प्रकरण आरम्भ करते हैं— सप्त गतेर्विशेषितत्वाच्च ॥ २।४।५॥ सप्त = इन्द्रियाँ सात हैं; गतेः = क्योंकि सात ही ज्ञात होती हैं; च = तथा; विशेषितत्वात् = 'सप्त प्राणाः' = कहकर श्रुतिने 'सप्त' पदका प्राणों (इन्द्रियों)- के विशेषणरूपसे प्रयोग किया है। व्याख्या—पूर्वपक्षीका कथन है कि मुख्यतः सात इन्द्रियाँ ही ज्ञात होती हैं और श्रुतिने 'जिनमें सात प्राण अर्थात् आँख, कान, नाक, रसना, त्वचा, वाक् और मन—ये सात इन्द्रियाँ विचरती हैं, वे लोक सात हैं।'* (मु० उ० २।१।८)। ऐसा कहकर इन्द्रियोंका 'सात' यह विशेषण दिया है। इससे यही सिद्ध होता है कि इन्द्रियाँ सात ही हैं। सम्बन्ध— अब सिद्धान्तीकी ओरसे उत्तर दिया जाता है— हस्तादयस्तु स्थितेऽतो नैवम् ॥ २।४।६॥ तु = किंतु; हस्तादयः = हाथ आदि अन्य इन्द्रियाँ भी हैं; अतः = इसलिये; स्थिते = इस स्थितिमें; एवम् = ऐसा; न = नहीं; (कहना चाहिये कि इन्द्रियाँ सात ही हैं।) व्याख्या—हाथ आदि (हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा) अन्य चार इन्द्रियोंका वर्णन भी पूर्वोक्त सात इन्द्रियोंके साथ-साथ दूसरी श्रुतियोंमें स्पष्ट आता है (प्र० उ० ४।८) तथा प्रत्येक मनुष्यके कार्यमें करणरूपसे हस्त आदि चारों इन्द्रियोंका प्रयोग प्रत्यक्ष उपलब्ध है; इसलिये यह नहीं कहा जा सकता
- सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥