वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 255, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें२५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ कि इन्द्रियाँ सात ही हैं। अतः जहाँ किसी अन्य उद्देश्यसे केवल सातोंका वर्णन हो वहाँ भी इन चारोंको अधिक समझ लेना चाहिये। गीतामें भी मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ बतायी गयी हैं (गीता १३। ५) तथा बृहदारण्यक श्रुतिमें भी दस इन्द्रियाँ और एक मन—इन ग्यारहका वर्णन स्पष्ट शब्दोंमें किया गया है (३। ९। ४)*। अतः इन्द्रियाँ सात नहीं ग्यारह हैं, यह मानना चाहिये। सम्बन्ध— इस प्रकार प्रसंगवश प्राप्त हुई शंकाका निराकरण करते हुए मनसहित इन्द्रियोंकी संख्या ग्यारह सिद्ध करके पुनः तत्त्वोंकी उत्पत्तिका वर्णन करते हैं— अणवश्च ॥ २ । ४ । ७ ॥ च=तथा; अणवः = सूक्ष्मभूत यानी तन्मात्राएँ भी उस परमेश्वरसे ही उत्पन्न होती हैं। व्याख्या— जिस प्रकार इन्द्रियोंकी उत्पत्ति परमेश्वरसे होती है, उसी प्रकार पाँच महाभूतोंका जो सूक्ष्मरूप है, जिसको दूसरे दर्शनकारोंने परमाणुके नामसे कहा है तथा उपनिषदोंमें मात्राके नामसे जिनका वर्णन है (प्र० उ० ४। ८) वे भी परमेश्वरसे ही उत्पन्न होते हैं; क्योंकि वहाँ उनकी स्थिति उस परमेश्वरके आश्रित ही बतायी गयी है। कुछ महानुभावोंका कहना है कि यह सूत्र इन्द्रियोंका अणु-परिमाण सिद्ध करनेके लिये कहा गया है, किंतु प्रसंगसे यह ठीक मालूम नहीं होता। त्वक्-इन्द्रियको अणु नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वह शरीरके किसी एक देशमें सूक्ष्मरूपसे स्थित न होकर समस्त शरीरको आच्छादित किये हुए रहती है, इस बातका सबको प्रत्यक्ष अनुभव है। अतः विद्वान् पुरुषोंको इसपर विचार करना चाहिये। इन्द्रियोंको अणु बतानेवाले व्याख्याकारोंने इस विषयमें श्रुतियों तथा स्मृतियोंका कोई प्रमाण भी उद्धृत नहीं किया है।
- दशैमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशः ।