वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 256, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ८—१० ] अध्याय २ २५३ श्रेष्ठश्च ॥ २ । ४ । ८ ॥ श्रेष्ठः = मुख्य प्राण; च = भी (उस परमात्मासे ही उत्पन्न होता है)। व्याख्या—जिसे प्राण नामसे कही जानेवाली इन्द्रियोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ सिद्ध किया गया है, (प्र० उ० २।३, ४; छा० उ० ५।१।७) जिसका प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—इन पाँच नामोंसे वर्णन किया जाता है, वह मुख्य प्राण भी इन्द्रिय आदिकी भाँति उस परमेश्वरसे ही उत्पन्न होता है। श्रुति भी इसका समर्थन करती है (मु० उ० २।१।३)।* सम्बन्ध—अब प्राणके स्वरूपका निर्धारण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— न वायुक्रिये पृथगुपदेशात् ॥ २ । ४ । ९ ॥ वायुक्रिये = (श्रुतिमें वर्णित मुख्य प्राण) वायुतत्त्व और उसकी क्रिया; न = नहीं है, पृथगुपदेशात् = क्योंकि उन दोनोंसे अलग इसका वर्णन है। व्याख्या—श्रुतिमें जहाँ प्राणकी उत्पत्तिका वर्णन आया है (मु० उ० २।१।३) वहाँ वायुकी उत्पत्तिका वर्णन अलग है। इसलिये श्रुतिमें वर्णित मुख्य प्राण* न तो वायुतत्त्व है और न वायुकी क्रियाका ही नाम मुख्य प्राण है, वह इन दोनोंसे भिन्न पदार्थ है, यही सिद्ध होता है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि प्राण यदि वायुतत्त्व नहीं है तो क्या जीवात्माकी भाँति स्वतन्त्र पदार्थ है, इसपर कहते हैं— चक्षुरादिवत्तु तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः ॥ २ । ४ । १० ॥ तु = किंतु (प्राण भी); चक्षुरादिवत् = चक्षु आदि इन्द्रियोंकी भाँति (जीवात्माका उपकरण है); तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः = क्योंकि उन्हींके साथ प्राण और इन्द्रियोंके संवादमें इसका वर्णन किया गया है तथा उनकी भाँति यह जड भी है ही।
- यह मन्त्र सूत्र २।३।१५ की टिप्पणीमें आ गया है।