भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 486 में से

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पृष्ठ 248

सूत्र ५०-५१ ] अध्याय २ २४५ सम्बन्ध— यहाँतक जीवात्मा परमात्माका अंश है तथा वह नित्य और विभु है, इस सिद्धान्तका श्रुति-स्मृतियोंके प्रमाणसे और युक्तियोंद्वारा भी भलीभाँति प्रतिपादन किया गया तथा अंशांशिभावके कारण अभेदप्रतिपादक श्रुतियोंकी भी सार्थकता सिद्ध की गयी। अब जो लोग जीवात्माका स्वरूप अन्य प्रकारसे मानते हैं, उनकी वह मान्यता ठीक नहीं है; इस बातको सिद्ध करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— आभासा एव च॥ २।३।५०॥ च=इसके सिवा; (अन्य प्रकारकी मान्यताके समर्थनमें दिये जानेवाले युक्तिप्रमाण) आभासाः=आभासमात्र; एव=ही हैं। व्याख्या—जो लोग जीवात्माको उस परब्रह्मका अंश नहीं मानते, सब जीवोंको अलग-अलग स्वतन्त्र मानते हैं, उन्होंने अपनी मान्यताको सिद्ध करनेके लिये जो युक्ति-प्रमाण दिये हैं, वे सब-के-सब आभासमात्र हैं; अतः उनका कथन ठीक नहीं है। जीवात्माओंको परमात्माका अंश मानना ही युक्तिसंगत है; क्योंकि ऐसा माननेपर ही समस्त श्रुतियोंके वर्णनकी एकवाक्यता हो सकती है। सम्बन्ध— परब्रह्म परमेश्वरको श्रुतिमें अखण्ड और अवयवरहित बताया गया है, इसलिये उसका अंश नहीं हो सकता। फिर भी जो जीवोंको उस परमात्माका अंश कहा जाता है, वह अंशांशिभाव वास्तविक नहीं है; घटाकाशकी भाँति उपाधिके निमित्तसे प्रतीत होता है, ऐसा माना जाय तो क्या आपत्ति है? अदृष्टानियमात् ॥ २।३।५१॥ अदृष्टानियमात्=अदृष्ट अर्थात् जन्मान्तरमें किये हुए कर्मफलभोगकी कोई नियत व्यवस्था नहीं हो सकेगी; इसलिये (उपाधिके निमित्तसे जीवोंको परमात्माका अंश मानना युक्तिसंगत नहीं है)। व्याख्या—जीवोंको परमात्माका अंश न मानकर अलग-अलग स्वतन्त्र माननेसे तथा घटाकाशकी भाँति उपाधिके निमित्तसे जीवगणको परमात्माका अंश माननेसे भी जीवोंके कर्मफल-भोगकी व्यवस्था नहीं हो सकेगी; क्योंकि

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