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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र ५०-५१ ] अध्याय २ २४५ सम्बन्ध— यहाँतक जीवात्मा परमात्माका अंश है तथा वह नित्य और विभु है, इस सिद्धान्तका श्रुति-स्मृतियोंके प्रमाणसे और युक्तियोंद्वारा भी भलीभाँति प्रतिपादन किया गया तथा अंशांशिभावके कारण अभेदप्रतिपादक श्रुतियोंकी भी सार्थकता सिद्ध की गयी। अब जो लोग जीवात्माका स्वरूप अन्य प्रकारसे मानते हैं, उनकी वह मान्यता ठीक नहीं है; इस बातको सिद्ध करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— आभासा एव च॥ २।३।५०॥ च=इसके सिवा; (अन्य प्रकारकी मान्यताके समर्थनमें दिये जानेवाले युक्तिप्रमाण) आभासाः=आभासमात्र; एव=ही हैं। व्याख्या—जो लोग जीवात्माको उस परब्रह्मका अंश नहीं मानते, सब जीवोंको अलग-अलग स्वतन्त्र मानते हैं, उन्होंने अपनी मान्यताको सिद्ध करनेके लिये जो युक्ति-प्रमाण दिये हैं, वे सब-के-सब आभासमात्र हैं; अतः उनका कथन ठीक नहीं है। जीवात्माओंको परमात्माका अंश मानना ही युक्तिसंगत है; क्योंकि ऐसा माननेपर ही समस्त श्रुतियोंके वर्णनकी एकवाक्यता हो सकती है। सम्बन्ध— परब्रह्म परमेश्वरको श्रुतिमें अखण्ड और अवयवरहित बताया गया है, इसलिये उसका अंश नहीं हो सकता। फिर भी जो जीवोंको उस परमात्माका अंश कहा जाता है, वह अंशांशिभाव वास्तविक नहीं है; घटाकाशकी भाँति उपाधिके निमित्तसे प्रतीत होता है, ऐसा माना जाय तो क्या आपत्ति है? अदृष्टानियमात् ॥ २।३।५१॥ अदृष्टानियमात्=अदृष्ट अर्थात् जन्मान्तरमें किये हुए कर्मफलभोगकी कोई नियत व्यवस्था नहीं हो सकेगी; इसलिये (उपाधिके निमित्तसे जीवोंको परमात्माका अंश मानना युक्तिसंगत नहीं है)। व्याख्या—जीवोंको परमात्माका अंश न मानकर अलग-अलग स्वतन्त्र माननेसे तथा घटाकाशकी भाँति उपाधिके निमित्तसे जीवगणको परमात्माका अंश माननेसे भी जीवोंके कर्मफल-भोगकी व्यवस्था नहीं हो सकेगी; क्योंकि

२४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

२४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ यदि जीवोंको अलग-अलग स्वतन्त्र मानते हैं तो उनके कर्मफल-भोगकी व्यवस्था कौन करेगा। जीवात्मा स्वयं अपने कर्मोंका विभाग करके ऐसा नियम बना ले कि अमुक कर्मका अमुक फल मुझे अमुक प्रकारसे भोगना है तो यह सम्भव नहीं है। कर्म जड हैं, अतः वे भी अपने फलका भोग करानेकी व्यवस्था स्वयं नहीं कर सकते। यदि ऐसा मानें कि एक ही परमात्मा घटाकाशकी भाँति अनादिसिद्ध शरीरादिकी उपाधियोंके निमित्तसे नाना जीवोंके रूपमें प्रतीत हो रहा है; तो भी उन जीवोंके कर्मफलभोगकी व्यवस्था नहीं हो सकती; क्योंकि इस मान्यताके अनुसार जीवात्मा और परमात्माका भेद वास्तविक न होनेके कारण समस्त जीवोंके कर्मोंका विभाग करना, उनके भोगनेवाले जीवोंका विभाग करना तथा परमात्माको उन सबसे अलग रहकर उनके कर्मफलोंका व्यवस्थापक मानना सम्भव न होगा। अतः श्रुतिके कथनानुसार यही मानना ठीक है कि सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वर ही सबके कर्मफलोंकी यथायोग्य व्यवस्था करता है तथा सब जीव उसीसे प्रकट होते हैं, इसलिये पिता- पुत्रकी भाँति उसके अंश हैं। सम्बन्ध - केवल कर्मफलभोगमें ही नहीं, संकल्प आदिमें भी उसी दोषकी प्राप्ति दिखाते हैं— अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम् ॥ २।३।५२ ॥ च = इसके सिवा; एवम् = इसी प्रकार; अभिसन्ध्यादिषु = संकल्प आदिमें; अपि = भी (अव्यवस्था होगी)। व्याख्या - ईश्वर तथा जीवोंका अंशांशिभाव वास्तविक नहीं, घटाकाशकी भाँति उपाधिके निमित्तसे प्रतीत होनेवाला है; यह माननेपर जिस प्रकार पूर्वसूत्रमें जीवोंके कर्मफल-भोगकी नियमित व्यवस्था न हो सकनेका दोष दिखाया गया है, उसी प्रकार उन जीवोंके संकल्प और इच्छा आदिके विभागकी नियमित व्यवस्था होनेमें भी बाधा पड़ेगी; क्योंकि उन सबके संकल्प आदि परस्पर अलग नहीं रह सकेंगे और परमात्माके संकल्प

आदिसे भी उनका भेद सिद्ध नहीं हो सकेगा। अतः शास्त्रमें जो परब्रह्म परमेश्वरके द्वारा ईक्षण (संकल्प)-पूर्वक जगत्की उत्पत्ति करनेका वर्णन है, उसकी भी संगति नहीं बैठेगी।

प्रदेशादिति चेन्नान्तर्भावात् ॥ २ । ३ । ५३ ॥

चेत् = यदि कहो; प्रदेशात् = उपाधियोंमें देशभेद होनेसे (सब व्यवस्था हो जायगी); इति न = तो यह नहीं हो सकता; अन्तर्भावात् = क्योंकि सभी देशोंका उपाधिमें और उपाधियोंका सब देशोंमें अन्तर्भाव है। व्याख्या—यदि कहो, उपाधियोंमें देशका भेद होनेसे सब जीवोंका अलग-अलग विभाग हो जायगा और उसीसे कर्मफल-भोग एवं संकल्प आदिकी भी व्यवस्था हो जायगी, तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि सर्वव्यापी परब्रह्म परमेश्वर सभी उपाधियोंमें व्याप्त है। उपाधियोंके देशभेदसे परमात्माके देशमें भेद नहीं हो सकता। प्रत्येक उपाधिका सम्बन्ध सब देशोंसे हो सकता है। उपाधि एक जगहसे दूसरी जगह जाय तो उसके साथ आकाश नहीं आता-जाता है। जब जिस देशमें उपाधि रहती है, उस समय वहाँका आकाश उसमें आ जाता है। इस प्रकार समस्त आकाशके प्रदेशका सब उपाधियोंमें अन्तर्भाव होगा। इसी तरह समस्त उपाधियोंका भी आकाशमें अन्तर्भाव होगा। किसी प्रकारसे कोई विभाग सिद्ध नहीं हो सकेगा। इसलिये परब्रह्म परमेश्वर और जीवात्माओंका अंशांशिभाव घटाकाशकी भाँति उपाधिनिमित्तक नहीं माना जा सकता।*

तीसरा पाद सम्पूर्ण

  • इसका विस्तार सूत्र ३ । ३ । ३५ से ३ । ३ । ४१ की व्याख्यामें पढ़ना चाहिये।

चौथा पाद

चौथा पाद **सम्बन्ध—**इसके पूर्व तीसरे पादमें पाँच भूतों तथा अन्तःकरणकी उत्पत्तिका प्रतिपादन किया गया और गौणरूपसे जीवात्माकी उत्पत्ति भी बतायी गयी। साथ ही प्रसंगवश जीवात्माके स्वरूपका भी विवेचन किया गया। किंतु वहाँ इन्द्रियोंकी और प्राणकी उत्पत्तिका प्रतिपादन नहीं हुआ, इसलिये उनकी उत्पत्तिका विचारपूर्वक प्रतिपादन करनेके लिये तथा तद्विषयक श्रुतियोंमें प्रतीत होनेवाले विरोधका निराकरण करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया जाता है। श्रुतिमें कहीं तो प्राण और इन्द्रियोंकी उत्पत्ति स्पष्ट शब्दोंमें परमेश्वरसे बतायी है (मु० उ० २।१।३; प्र० उ० ६।४), कहीं अग्नि, जल और पृथिवीसे उनका उत्पन्न होना बताया गया है (छा० उ० ६। ६।२ से ५) तथा कहीं आकाश आदिके क्रमसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन है, वहाँ इन प्राण और इन्द्रिय आदिका नामतक नहीं आया है (तै० उ० २।१) और कहीं तत्त्वोंकी उत्पत्तिके पहले ही इनका होना माना है (शतपथब्रा० ६।१।१।१) उससे इनकी उत्पत्तिका निषेध प्रतीत होता है। इसलिये श्रुतिवाक्योंमें प्रतीत होनेवाले विरोधका निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं— तथा प्राणाः ॥ २।४।१ ॥ तथा = उसी प्रकार; प्राणाः = प्राणशब्दवाच्य इन्द्रियाँ भी (परमेश्वरसे ही उत्पन्न होती हैं)। **व्याख्या—**जिस प्रकार आकाशादि पाँचों तत्त्व तथा अन्य सब परब्रह्म परमेश्वरसे उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार समस्त इन्द्रियाँ भी उसी परमेश्वरसे उत्पन्न होती हैं; क्योंकि उन आकाश आदिकी और इन्द्रियोंकी उत्पत्तिमें किसी प्रकारका भेद नहीं है। श्रुति स्पष्ट कहती है कि 'इस परब्रह्म परमेश्वरसे ही प्राण, मन, समस्त इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, ज्योति, जल और सबको धारण

सूत्र २ ] अध्याय २ २४९

सूत्र २ ] अध्याय २ २४९ करनेवाली पृथिवी उत्पन्न होती है।'* (मु० उ० २।१।३) इस प्रकार इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका श्रुतिमें वर्णन होनेसे यही सिद्ध होता है कि इन्द्रियाँ भी उस परमेश्वरसे ही उत्पन्न होती हैं। सम्बन्ध— जहाँ पहले तेज, जल और पृथिवीकी उत्पत्ति बताते हुए जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया गया है, वहाँ स्पष्ट कहा है कि 'वाणी तेजोमयी है अर्थात् वाक् इन्द्रिय तेजसे उत्पन्न हुई है; इसलिये तेजसे ओतप्रोत है।' इससे तो पाँचों भूतोंसे ही इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका होना सिद्ध होता है जैसा कि दूसरे मतवाले मानते हैं। इस परिस्थितिमें दोनों श्रुतियोंकी एकता कैसे होगी ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— गौण्यसम्भवात् ॥ २।४।२ ॥ असम्भवात् = सम्भव न होनेके कारण वह श्रुति; गौणी = गौणी है अर्थात् उसका कथन गौणरूपसे है। व्याख्या—उस श्रुतिमें कहा गया है कि 'भक्षण किये हुए तेजका जो सूक्ष्म अंश है, वह एकत्र होकर वाणी बनता है।' (छा० उ० ६।६।४) इससे यह सिद्ध होता है कि तैजस पदार्थका सूक्ष्म अंश वाणीको बलवान् बनाता है; क्योंकि श्रुतिने खाये हुए तैजस पदार्थोंके सूक्ष्मांशका ही ऐसा परिणाम बताया है, इसलिये जिसके द्वारा यह खाया जाय, उस इन्द्रियका तैजस तत्त्वसे पहले ही उत्पन्न होना सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार वहाँ खाये हुए अन्नसे मनकी और पीये हुए जलसे प्राणोंकी उत्पत्ति बतायी गयी है। परंतु प्राणोंके बिना जलका पीना ही सिद्ध नहीं होगा। फिर उससे प्राणोंकी उत्पत्ति कैसे सिद्ध होगी? अतः जैसे प्राणोंका उपकारी होनेसे जलको गौणरूपसे प्राणोंकी उत्पत्तिका हेतु कहा गया है, वैसे ही वाक्-इन्द्रियका उपकारी होनेसे तैजस पदार्थोंको वाक्-इन्द्रियकी उत्पत्तिका हेतु गौणरूपसे ही कहा गया है। इसलिये वह श्रुति गौणी है, अर्थात् उसके द्वारा तेज आदि तत्त्वोंसे वाक् आदि

  • यह मन्त्र पृष्ठ २१५ की टिप्पणीमें आ गया है।

२५० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका कथन गौण है; यही मानना ठीक है और ऐसा मान लेनेपर श्रुतियोंके वर्णनमें कोई विरोध नहीं रह जाता है। सम्बन्ध— प्रकारान्तरसे उस श्रुतिका गौणत्व सिद्ध करते हैं— तत्प्राक्छुतेश्च ॥ २ । ४ । ३ ॥ तत्प्राक्छुतेः= श्रुतिके द्वारा उन आकाशादि तत्त्वोंके पहले इन्द्रियोंकी उत्पत्ति कही गयी है, इसलिये; च=भी (तेज आदिसे वाक् आदि इन्द्रियकी उत्पत्ति कहनेवाली श्रुति गौण है)। व्याख्या—शतपथ-ब्राह्मणमें ऋषियोंके नामसे इन्द्रियोंका पाँच तत्त्वोंकी उत्पत्तिसे पहले होना कहा गया है (६। १। १। १) तथा मुण्डकोपनिषद्में भी इन्द्रियोंकी उत्पत्ति पाँच भूतोंसे पहले बतायी गयी है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि आकाशादि तत्त्वोंसे इन्द्रियोंकी उत्पत्ति नहीं हुई है, अतः तेज आदि तत्त्वोंसे वाक् आदिकी उत्पत्ति सूचित करनेवाली वह श्रुति गौण है। सम्बन्ध— अब दूसरी युक्ति देकर उक्त बातकी ही पुष्टि करते हैं— तत्पूर्वकत्वाद्वाचः ॥ २ । ४ । ४ ॥ वाचः=वाणीकी उत्पत्तिका वर्णन; तत्पूर्वकत्वात्=तीनों तत्त्वोंमें उस ब्रह्मके प्रविष्ट होनेके बाद है (इसलिये तेजसे उसकी उत्पत्ति सूचित करनेवाली श्रुति गौण है)। व्याख्या—उस प्रकरणमें यह कहा गया है कि 'उन तीन तत्त्वरूप देवताओंमें जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर उस ब्रह्मने नामरूपात्मक जगत्की रचना की।' (छा० उ० ६। ३। ३) इस प्रकार वहाँ जगत्की उत्पत्ति ब्रह्मके प्रवेशपूर्वक बतायी गयी है; इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि समस्त इन्द्रियोंकी उत्पत्ति ब्रह्मसे ही हुई है, तेज आदि तत्त्वोंसे नहीं। अतः तेज- तत्त्वसे वाणीकी उत्पत्ति सूचित करनेवाली श्रुतिका कथन गौण है। सम्बन्ध—इस प्रकार इन्द्रियोंकी उत्पत्ति भी उस ब्रह्मसे ही होती है

सूत्र ५-६ ] अध्याय २ २५१ और वह पाँच तत्त्वोंसे पहले ही हो जाती है; यह सिद्ध किया गया। अब जो श्रुतियोंमें कहीं तो प्राणोंके नामसे सात इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका वर्णन किया गया है (मु० उ० २।१।८) तथा कहीं मनसहित ग्यारह इन्द्रियोंका वर्णन है (बृह० उ० ३।९।४) इनमेंसे कौन-सा वर्णन ठीक है, उसका निर्णय करनेके लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना करते हुए प्रकरण आरम्भ करते हैं— सप्त गतेर्विशेषितत्वाच्च ॥ २।४।५॥ सप्त = इन्द्रियाँ सात हैं; गतेः = क्योंकि सात ही ज्ञात होती हैं; च = तथा; विशेषितत्वात् = 'सप्त प्राणाः' = कहकर श्रुतिने 'सप्त' पदका प्राणों (इन्द्रियों)- के विशेषणरूपसे प्रयोग किया है। व्याख्या—पूर्वपक्षीका कथन है कि मुख्यतः सात इन्द्रियाँ ही ज्ञात होती हैं और श्रुतिने 'जिनमें सात प्राण अर्थात् आँख, कान, नाक, रसना, त्वचा, वाक् और मन—ये सात इन्द्रियाँ विचरती हैं, वे लोक सात हैं।'* (मु० उ० २।१।८)। ऐसा कहकर इन्द्रियोंका 'सात' यह विशेषण दिया है। इससे यही सिद्ध होता है कि इन्द्रियाँ सात ही हैं। सम्बन्ध— अब सिद्धान्तीकी ओरसे उत्तर दिया जाता है— हस्तादयस्तु स्थितेऽतो नैवम् ॥ २।४।६॥ तु = किंतु; हस्तादयः = हाथ आदि अन्य इन्द्रियाँ भी हैं; अतः = इसलिये; स्थिते = इस स्थितिमें; एवम् = ऐसा; न = नहीं; (कहना चाहिये कि इन्द्रियाँ सात ही हैं।) व्याख्या—हाथ आदि (हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा) अन्य चार इन्द्रियोंका वर्णन भी पूर्वोक्त सात इन्द्रियोंके साथ-साथ दूसरी श्रुतियोंमें स्पष्ट आता है (प्र० उ० ४।८) तथा प्रत्येक मनुष्यके कार्यमें करणरूपसे हस्त आदि चारों इन्द्रियोंका प्रयोग प्रत्यक्ष उपलब्ध है; इसलिये यह नहीं कहा जा सकता

  • सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥

२५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

२५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ कि इन्द्रियाँ सात ही हैं। अतः जहाँ किसी अन्य उद्देश्यसे केवल सातोंका वर्णन हो वहाँ भी इन चारोंको अधिक समझ लेना चाहिये। गीतामें भी मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ बतायी गयी हैं (गीता १३। ५) तथा बृहदारण्यक श्रुतिमें भी दस इन्द्रियाँ और एक मन—इन ग्यारहका वर्णन स्पष्ट शब्दोंमें किया गया है (३। ९। ४)*। अतः इन्द्रियाँ सात नहीं ग्यारह हैं, यह मानना चाहिये। सम्बन्ध— इस प्रकार प्रसंगवश प्राप्त हुई शंकाका निराकरण करते हुए मनसहित इन्द्रियोंकी संख्या ग्यारह सिद्ध करके पुनः तत्त्वोंकी उत्पत्तिका वर्णन करते हैं— अणवश्च ॥ २ । ४ । ७ ॥ च=तथा; अणवः = सूक्ष्मभूत यानी तन्मात्राएँ भी उस परमेश्वरसे ही उत्पन्न होती हैं। व्याख्या— जिस प्रकार इन्द्रियोंकी उत्पत्ति परमेश्वरसे होती है, उसी प्रकार पाँच महाभूतोंका जो सूक्ष्मरूप है, जिसको दूसरे दर्शनकारोंने परमाणुके नामसे कहा है तथा उपनिषदोंमें मात्राके नामसे जिनका वर्णन है (प्र० उ० ४। ८) वे भी परमेश्वरसे ही उत्पन्न होते हैं; क्योंकि वहाँ उनकी स्थिति उस परमेश्वरके आश्रित ही बतायी गयी है। कुछ महानुभावोंका कहना है कि यह सूत्र इन्द्रियोंका अणु-परिमाण सिद्ध करनेके लिये कहा गया है, किंतु प्रसंगसे यह ठीक मालूम नहीं होता। त्वक्-इन्द्रियको अणु नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वह शरीरके किसी एक देशमें सूक्ष्मरूपसे स्थित न होकर समस्त शरीरको आच्छादित किये हुए रहती है, इस बातका सबको प्रत्यक्ष अनुभव है। अतः विद्वान् पुरुषोंको इसपर विचार करना चाहिये। इन्द्रियोंको अणु बतानेवाले व्याख्याकारोंने इस विषयमें श्रुतियों तथा स्मृतियोंका कोई प्रमाण भी उद्धृत नहीं किया है।

  • दशैमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशः ।

सूत्र ८—१० ] अध्याय २ २५३

सूत्र ८—१० ] अध्याय २ २५३ श्रेष्ठश्च ॥ २ । ४ । ८ ॥ श्रेष्ठः = मुख्य प्राण; च = भी (उस परमात्मासे ही उत्पन्न होता है)। व्याख्या—जिसे प्राण नामसे कही जानेवाली इन्द्रियोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ सिद्ध किया गया है, (प्र० उ० २।३, ४; छा० उ० ५।१।७) जिसका प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—इन पाँच नामोंसे वर्णन किया जाता है, वह मुख्य प्राण भी इन्द्रिय आदिकी भाँति उस परमेश्वरसे ही उत्पन्न होता है। श्रुति भी इसका समर्थन करती है (मु० उ० २।१।३)।* सम्बन्ध—अब प्राणके स्वरूपका निर्धारण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— न वायुक्रिये पृथगुपदेशात् ॥ २ । ४ । ९ ॥ वायुक्रिये = (श्रुतिमें वर्णित मुख्य प्राण) वायुतत्त्व और उसकी क्रिया; न = नहीं है, पृथगुपदेशात् = क्योंकि उन दोनोंसे अलग इसका वर्णन है। व्याख्या—श्रुतिमें जहाँ प्राणकी उत्पत्तिका वर्णन आया है (मु० उ० २।१।३) वहाँ वायुकी उत्पत्तिका वर्णन अलग है। इसलिये श्रुतिमें वर्णित मुख्य प्राण* न तो वायुतत्त्व है और न वायुकी क्रियाका ही नाम मुख्य प्राण है, वह इन दोनोंसे भिन्न पदार्थ है, यही सिद्ध होता है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि प्राण यदि वायुतत्त्व नहीं है तो क्या जीवात्माकी भाँति स्वतन्त्र पदार्थ है, इसपर कहते हैं— चक्षुरादिवत्तु तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः ॥ २ । ४ । १० ॥ तु = किंतु (प्राण भी); चक्षुरादिवत् = चक्षु आदि इन्द्रियोंकी भाँति (जीवात्माका उपकरण है); तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः = क्योंकि उन्हींके साथ प्राण और इन्द्रियोंके संवादमें इसका वर्णन किया गया है तथा उनकी भाँति यह जड भी है ही।

  • यह मन्त्र सूत्र २।३।१५ की टिप्पणीमें आ गया है।

२५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

२५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्में मुख्य प्राणकी श्रेष्ठता सूचित करनेवाली एक कथा आती है, जो इस प्रकार है—एक समय सब इन्द्रियाँ परस्पर विवाद करती हुई कहने लगीं—'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ।' अन्तमें वे अपना न्याय करानेके लिये प्रजापतिके पास गयीं। वहाँ उन सबने उनसे पूछा—'भगवन्! हममें सर्वश्रेष्ठ कौन है?' प्रजापतिने कहा—'तुममेंसे जिसके निकलनेसे शरीर मुर्दा हो जाय, वही श्रेष्ठ है।' यह सुनकर वाणी शरीरसे बाहर निकली, फिर चक्षु, उसके बाद श्रोत्र। इस प्रकार एक- एक इन्द्रियके निकलनेपर भी शरीरका काम चलता रहा; अन्तमें जब मुख्य प्राणने शरीरसे बाहर निकलनेकी तैयारी की तब प्राणशब्दवाच्य मनसहित सब इन्द्रियोंको अपने-अपने स्थानसे विचलित कर दिया। यह देख वे सब इन्द्रियाँ घबरायीं और मुख्य प्राणसे कहने लगीं—'तुम्हीं हम सबमें श्रेष्ठ हो, तुम बाहर मत जाओ' (छा० उ० ५।१।६ से १२)। इस वर्णनमें जीवात्माके मन और चक्षु आदि अन्य करणोंके साथ-साथ प्राणका वर्णन आया है, इससे यह सिद्ध होता है कि जिस प्रकार वे स्वतन्त्र नहीं हैं, जीवात्माके अधीन हैं, उसी प्रकार मुख्य प्राण भी उसके अधीन है। इसीलिये इन्द्रियनिग्रहकी भाँति शास्त्रोंमें प्राणको निग्रह करनेका भी उपदेश है। तथा 'आदि' शब्दसे यह भी सूचित किया गया है कि इन्द्रियादिकी भाँति यह जड भी है, अतः जीवात्माकी भाँति चेतन नहीं हो सकता। सम्बन्ध—"यदि चक्षु आदि इन्द्रियोंकी भाँति प्राण भी किसी विषयके अनुभवका द्वार अथवा किसी कार्यकी सिद्धिमें सहायक होता तब तो इसको भी 'करण' कहना ठीक था; परंतु ऐसा नहीं देखा जाता। शास्त्रमें भी मन तथा दस इन्द्रियोंको ही प्रत्येक कार्यमें करण बताया गया है, प्राणको नहीं। यदि प्राणको 'करण' माना जाय तो उसके लिये भी किसी ग्राह्य विषयकी कल्पना करनी पड़ेगी।" इस शंकाका निवारण करनेके लिये कहते हैं— अकरणत्वाच्च न दोषस्तथा हि दर्शयति ॥ २।४।११॥ च=निश्चय ही; अकरणत्वात् =(इन्द्रियोंकी भाँति) विषयोंके उपभोगमें

सूत्र १२ ] अध्याय २ २५५

सूत्र १२ ] अध्याय २ २५५ करण न होनेके कारण; दोषः=उक्त दोष; न=नहीं है; हि=क्योंकि; तथा=इसका करण होना कैसा है, यह बात; दर्शयति=श्रुति स्वयं दिखाती है। व्याख्या—जिस प्रकार चक्षु आदि इन्द्रियाँ रूप आदि विषयोंका ज्ञान करानेमें करण हैं, इस प्रकार विषयोंके उपभोगमें करण न होनेपर भी उसको जीवात्माके लिये करण माननेमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि उन सब इन्द्रियोंको प्राण ही धारण करता है, इस शरीर और इन्द्रियोंका पोषण भी प्राण ही करता है, प्राणके संयोगसे ही जीवात्मा एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है। इस प्रकार श्रुतिमें इसके करणभावको दिखाया गया है (छा० उ० ५।१।६ से प्रकरणकी समाप्तितक)। इस प्रकरणके सिवा और भी जहाँ-जहाँ मुख्य प्राणका प्रकरण आया है, सभी जगह ऐसी ही बात कही गयी है (प्र० उ० ३।१ से १२ तक)। सम्बन्ध—इतना ही नहीं, अपितु— पञ्चवृत्तिर्मनोवद् व्यपदिश्यते ॥ २।४।१२॥ मनोवत् (श्रुतिके द्वारा यह) मनकी भाँति; पञ्चवृत्तिः=पाँच वृत्तियोंवाला; व्यपदिश्यते=बताया जाता है। व्याख्या—जिस प्रकार श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियोंके रूपमें मनकी पाँच वृत्तियाँ मानी गयी हैं, उसी प्रकार श्रुतिने इस मुख्य प्राणको भी पाँच वृत्तिवाला बताया है (बृह० उ० १।५।३)। प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान—ये ही उसकी पाँच वृत्तियाँ हैं, इनके द्वारा यह अनेक प्रकारसे जीवात्माके उपयोगमें आता है। श्रुतियोंमें इसकी वृत्तियोंका भिन्न-भिन्न कार्य विस्तारपूर्वक बताया गया है (प्र० उ० ३।४ से ७)। इसलिये भी प्राणको जीवात्माका उपकरण मानना उचित ही है। सम्बन्ध—मुख्य प्राणके लक्षणोंका प्रतिपादन करनेके लिये नवें सूत्रसे प्रकरण आरम्भ करके बारहवें सूत्रतक यह सिद्ध किया गया है कि ‘प्राण’ जीवात्मा तथा वायुतत्त्वसे भी भिन्न है। मन और इन्द्रियोंको धारण करनेके कारण यह भी जीवात्माका उपकरण है। शरीरमें यह पाँच प्रकारसे विचरता हुआ शरीरको

२५६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ धारण करता है और उसमें क्रियाशक्तिका संचार करता है। अब अगले सूत्रमें इसके स्वरूपका प्रतिपादन करके इस प्रकरणको समाप्त करते हैं— अणुश्च ॥ २ । ४ । १३ ॥ अणुः=यह सूक्ष्म; च=भी है। व्याख्या—यह प्राणतत्त्व अपनी पाँच वृत्तियोंके द्वारा स्थूलरूपमें उपलब्ध होता है; इसके सिवा, यह अणु अर्थात् सूक्ष्म भी है। यहाँ अणु कहनेसे यह भाव नहीं समझना चाहिये कि यह छोटे आकारवाला है; इसकी सूक्ष्मताको लक्षित करानेके लिये इसे अणु कहा गया है। सूक्ष्म होनेके साथ ही यह परिच्छिन्न तत्त्व है। सूक्ष्मताके कारण व्यापक होनेपर भी सीमित है। ये सब बातें भी प्रश्नोपनिषद्के तीसरे प्रश्नके उत्तरमें आ गयी हैं। सम्बन्ध—छान्दोग्य-श्रुतिमें जहाँ तेज प्रभृति तीन तत्त्वोंसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया गया है, वहाँ उन तीनोंका अधिष्ठाता देवता किसको बताया गया है? यह निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् ॥ २ । ४ । १४ ॥ ज्योतिराद्यधिष्ठानम् = ज्योति आदि तत्त्व जिसके अधिष्ठान बताये गये हैं, वह; तु=तो ब्रह्म ही है; तदामननात् = क्योंकि दूसरी जगह भी श्रुतिके द्वारा उसीको अधिष्ठाता बताया गया है। व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि उस जगत्कर्ता परमदेवने विचार किया कि 'मैं बहुत होऊँ, तब उसने तेजकी रचना की, फिर तेजने विचार किया।' इत्यादि (छा० उ० ६।२।३-४) इस वर्णनमें जो तेज आदि तत्त्वमें विचार करनेवाला उनका अधिष्ठाता बताया गया है, वह परमात्मा ही है; क्योंकि तैत्तिरीयोपनिषद्में कहा है कि 'इस जगत्की रचना करके उसने उसमें जीवात्माके साथ-साथ प्रवेश किया।' (तै० उ० २।६) इसलिये यही सिद्ध होता है कि परमेश्वरने ही उन तत्त्वोंमें अधिष्ठातारूपसे प्रविष्ट होकर विचार किया, स्वतन्त्र जड तत्त्वोंने नहीं। सम्बन्ध—अब यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यदि वह परब्रह्म परमेश्वर

सूत्र १५] अध्याय २ २५७

सूत्र १५] अध्याय २ २५७ ही उन आकाशादि तत्त्वोंका अधिष्ठाता है, तब तो प्रत्येक शरीरका अधिष्ठाता भी वही होगा। जीवात्माको शरीरका अधिष्ठाता मानना भी उचित नहीं होगा, इसपर कहते हैं— प्राणवता शब्दात्॥ २।४।१५॥ प्राणवता=(ब्रह्मने) प्राणधारी जीवात्माके सहित (प्रवेश किया); शब्दात्=ऐसा श्रुतिका कथन होनेसे यह दोष नहीं है। व्याख्या—श्रुतिमें यह भी वर्णन आया है कि इन तीनों तत्त्वोंको उत्पन्न करनेके बाद उस परमदेवने विचार किया, 'अब मैं इस जीवात्माके सहित इन तीनों देवताओंमें प्रविष्ट होकर नाना नाम-रूपोंको प्रकट करूँ।'१ (छा० उ० ६।३।२) इस कथनसे यह सिद्ध होता है कि जीवात्माके सहित परमात्माने उन तत्त्वोंमें प्रविष्ट होकर जगत्का विस्तार किया। इसी प्रकार ऐतरेयोपनिषद्के पहले अध्यायमें जगत्की उत्पत्तिका वर्णन करते हुए तीसरे खण्डमें यह बताया गया है कि जीवात्माको सहयोग देनेके लिये जगत्कर्ता परमेश्वरने सजीव शरीरमें प्रवेश किया। तथा मुण्डक और श्वेताश्वतरमें ईश्वर और जीवको दो पक्षियोंकी भाँति एक ही शरीररूप वृक्षपर स्थित बताया गया है।२ इसी प्रकार कठोपनिषद्में भी परमात्मा और जीवात्माको हृदयरूप गुहामें स्थित कहा गया है।३ इन सब वर्णनोंसे जीवात्मा और परमेश्वर—इन दोनोंका प्रत्येक शरीरमें साथ-साथ रहना सिद्ध होता है। इसलिये जीवात्माको शरीरका अधिष्ठाता माननेमें किसी प्रकारका विरोध नहीं है। सम्बन्ध—श्रुतिमें तत्त्वोंकी उत्पत्तिके पहले या पीछे भी जीवात्माकी उत्पत्तिका वर्णन नहीं आया, फिर उस परमेश्वरने सहसा यह विचार कैसे कर लिया कि 'इस जीवात्माके सहित मैं इन तत्त्वोंमें प्रवेश करूँ?' ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— १-यह मन्त्र सूत्र १।२।११ की व्याख्यामें आ गया है। २-यह मन्त्र सूत्र १।३।७ की व्याख्यामें आ गया है। ३-यह मन्त्र सूत्र १।२।११ की व्याख्यामें आ गया है।

२५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

२५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ तस्य च नित्यत्वात् ॥ २ । ४ । १६ ॥ तस्य = उस जीवात्माकी; नित्यत्वात् = नित्यता प्रसिद्ध होनेके कारण; च = भी (उसकी उत्पत्तिका वर्णन करना उचित ही है) । व्याख्या—जीवात्माको नित्य माना गया है। सृष्टिके समय शरीरकी उत्पत्तिके साथ-साथ गौणरूपसे ही उसकी उत्पत्ति बतायी गयी है (सू० २।३।१६), वास्तवमें उसकी उत्पत्ति नहीं मानी गयी है। (सू० २।३।१७) इसलिये पंचभूतोंकी उत्पत्तिके पहले या बाद उसकी उत्पत्ति न बतलाकर जो जीवात्माके सहित परमेश्वरका शरीरमें प्रविष्ट होना कहा गया है, वह उचित ही है। उसमें किसी प्रकारका विरोध नहीं है। सम्बन्ध—श्रुतिमें प्राणके नामसे इन्द्रियोंका वर्णन आया है, इससे यह जान पड़ता है कि इन्द्रियाँ मुख्य प्राणके ही कार्य हैं, उसीकी वृत्तियाँ हैं, भिन्न तत्त्व नहीं है। अथवा यह अनुमान होता है कि चक्षु आदिकी भाँति मुख्य प्राण भी एक इन्द्रिय है, उन्हींकी जातिका पदार्थ है। ऐसी दशामें वास्तविक बात क्या है ? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— त इन्द्रियाणि तद्व्यपदेशादन्यत्र श्रेष्ठात् ॥ २ । ४ । १७ ॥ ते = वे मन आदि ग्यारह; इन्द्रियाणि = इन्द्रिय; श्रेष्ठात् = मुख्य प्राणसे भिन्न हैं; अन्यत्र तद्व्यपदेशात् = क्योंकि दूसरी श्रुतियोंसे उसका भिन्नतासे वर्णन है। व्याख्या—दूसरी श्रुतियोंमें मुख्य प्राणकी गणना इन्द्रियोंसे अलग की गयी है तथा इन्द्रियोंको प्राणोंके नामसे नहीं कहा गया है। (मु० उ० २।१।३)* इसलिये पूर्वोक्त चक्षु आदि दसों इन्द्रियाँ और मन मुख्य प्राणसे सर्वथा भिन्न पदार्थ हैं। न तो वे मुख्य प्राणके कार्य हैं, न मुख्य प्राण उनकी भाँति इन्द्रियोंकी गणनामें हैं। इन सबकी शरीरमें स्थिति मुख्य प्राणके अधीन है, इसलिये गौणरूपसे श्रुतिमें इन्द्रियोंको प्राणके नामसे कहा गया है।

  • देखें सूत्र २।३।१५ की टिप्पणी।

सूत्र १८-१९ ] अध्याय २ २५९

सूत्र १८-१९ ] अध्याय २ २५९ सम्बन्ध- इन्द्रियोंसे मुख्य प्राणकी भिन्नता सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं- भेदश्रुतेः ॥ २ । ४ । १८ ॥ भेदश्रुतेः = इन्द्रियोंसे मुख्य प्राणका भेद सुना गया है, इसलिये (भी मुख्य प्राण उनसे भिन्न तत्त्व सिद्ध होता है)। व्याख्या- श्रुतिमें जहाँ इन्द्रियोंका प्राणके नामसे वर्णन आया है, वहाँ भी उनका मुख्य प्राणसे भेद कर दिया गया है (मु० उ० २।१।३ तथा बृह० उ० १।३।३) तथा प्रश्नोपनिषद्में भी मुख्य प्राणकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करनेके लिये अन्य सब तत्त्वोंसे और इन्द्रियोंसे मुख्य प्राणको अलग बताया है (प्र० उ० २।२, ३)। इस प्रकार श्रुतियोंमें मुख्य प्राणका इन्द्रियोंसे भेद बताया जानेके कारण भी यही सिद्ध होता है कि मुख्य प्राण इन सबसे भिन्न है। सम्बन्ध - इसके सिवा- वैलक्षण्याच्च ॥ २ । ४ । १९ ॥ वैलक्षण्यात् = परस्पर विलक्षणता होनेके कारण; च = भी (यही सिद्ध होता है कि मुख्य प्राणसे इन्द्रियाँ भिन्न पदार्थ हैं)। व्याख्या-सब इन्द्रियाँ और अन्तःकरण सुषुप्तिके समय विलीन हो जाते हैं, उस समय भी मुख्य प्राण जागता रहता है, उसपर निद्राका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यही इन सबकी अपेक्षा मुख्य प्राणकी विलक्षणता है; इस कारण भी यही सिद्ध होता है कि मुख्य प्राणसे इन्द्रियाँ भिन्न हैं। न तो इन्द्रियाँ प्राणका कार्य या वृत्तियाँ हैं और न मुख्य प्राण ही इन्द्रिय है, इन्द्रियोंको गौणरूपसे ही 'प्राण' नाम दिया गया है। सम्बन्ध - तेज आदि तत्त्वोंकी रचना करके परमात्माने जीवसहित उनमें प्रवेश करनेके पश्चात् नाम-रूपात्मक जगत्‌का विस्तार किया-यह

२६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

२६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ श्रुतिमें वर्णन आया है। इस प्रसंगमें यह संदेह होता है कि नाम-रूपादिको रचना करनेवाला कोई जीवविशेष है या परमात्मा ही। अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— संज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्तु त्रिवृत्कुर्वत उपदेशात् ॥ २ । ४ । २० ॥ संज्ञामूर्तिक्लृप्तिः = नाम-रूपकी रचना; तु = भी; त्रिवृत्कुर्वतः = तीनों तत्त्वोंका मिश्रण करनेवाले परमेश्वरका (ही कर्म है); उपदेशात् = क्योंकि वहाँ श्रुतिके वर्णनसे यही बात सिद्ध होती है। व्याख्या—इस समस्त नाम-रूपात्मक जगत्की रचना करना जीवात्माका काम नहीं है। वहाँ जो जीवात्माके सहित परमात्माके प्रविष्ट होनेकी बात कही गयी है, उसका अभिप्राय जीवात्माके कर्तापनमें परमात्माके कर्तृत्वकी प्रधानता बताना है। उसे सृष्टिकर्ता बताना नहीं; क्योंकि जीवात्माके कर्म- संस्कारोंके अनुसार उसको कर्म करनेकी शक्ति आदि और प्रेरणा देनेवाला वही है। अतएव वहाँके वर्णनसे यही सिद्ध होता है कि नाम-रूपसे व्यक्त की जानेवाली इस जड-चेतनात्मक जगत्की रचनारूप क्रिया उस परब्रह्म परमेश्वरकी ही है जिसने उन तत्त्वोंको उत्पन्न करके उनका मिश्रण किया है; अन्य किसीकी नहीं। सम्बन्ध—उस परमात्माने तीनोंका मिश्रण करके उनसे यदि जगत्की उत्पत्ति की तो किस तत्त्वसे कौन पदार्थ उत्पन्न हुआ? इसका विभाग किस प्रकार उपलब्ध होगा, इसपर कहते हैं— मांसादि भौमं यथाशब्दमितरयोश्च ॥ २ । ४ । २१ ॥ (जिस प्रकार) मांसादि = मांस आदि; भौमम् = पृथिवीके कार्य बताये गये हैं, (वैसे ही); यथाशब्दम् = वहाँ श्रुतिके शब्दद्वारा बताये अनुसार; इतरयोः = दूसरे दोनों तत्त्वोंका कार्य; च = भी समझ लेना चाहिये। व्याख्या—भूमि यानी पृथिवीके कार्यको भौम कहते हैं। उस प्रकरणमें जिस प्रकार भूमिरूप अन्नके कार्य मांस, विष्ठा और मन—ये तीनों बताये गये हैं, उसी प्रकार उस प्रकरणके शब्दोंमें जिस-जिस तत्त्वके जो-जो कार्य

सूत्र २२ ] अध्याय २ २६१

सूत्र २२ ] अध्याय २ २६१ बताये गये हैं, उसके वे ही कार्य हैं ऐसा समझ लेना चाहिये। वहाँ श्रुतिने जलका कार्य मूत्र, रक्त और प्राणको तथा तेजका कार्य हड्डी, मज्जा और वाणीको बताया है। अतः इन्हें ही उनका कार्य समझना चाहिये। सम्बन्ध - जब तीनों तत्त्वोंका मिश्रण करके सबकी रचना की गयी, तब खाये हुए किसी एक तत्त्वसे अमुक वस्तु हुई - इत्यादि रूपसे वर्णन करना कैसे संगत हो सकता है? इसपर कहते हैं- वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः ॥ २।४।२२ ॥ तद्वादः = वह कथन; तद्वादः = वह कथन; तु = तो; वैशेष्यात् = अधिकताके नातेसे है। व्याख्या - तीनोंके मिश्रणमें भी एककी अधिकता और दूसरोंकी न्यूनता रहती है, अतः जिसकी अधिकता रहती है उस अधिकताको लेकर व्यवहारमें मिश्रित तत्त्वोंका अलग-अलग नामसे कथन किया जाता है; इसलिये कोई विरोध नहीं है। यहाँ 'तद्वादः' पदका दो बार प्रयोग अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है। इस प्रकरणमें जो मनको अन्नका कार्य और अन्नमय कहा गया है, प्राणोंको जलका कार्य और जलमय कहा गया है तथा वाणीको तेजका कार्य और तेजोमयी कहा गया है, वह भी उन-उन तत्त्वोंके सम्बन्धसे उनका उपकार होता हुआ देखा जानेके कारण गौणरूपसे ही कहा हुआ मानना चाहिये। वास्तवमें मन, प्राण और वाणी आदि इन्द्रियाँ भूतोंका कार्य नहीं हैं; भूतोंसे भिन्न पदार्थ हैं, यह बात पहले सिद्ध की जा चुकी है (ब्र० सू० २।४।२)। चौथा पाद सम्पूर्ण श्रीवेदव्यास रचित वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र)-का दूसरा अध्याय पूरा हुआ।

तीसरा अध्याय

॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥ तीसरा अध्याय पहला पाद पूर्व दो अध्यायोंमें ब्रह्म और जीवात्माके स्वरूपका प्रतिपादन किया गया, अब उस परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिका उपाय बतानेके लिये तीसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसीलिये इस अध्यायको साधनाध्याय अथवा उपासनाध्याय कहते हैं। परमात्माकी प्राप्तिके साधनोंमें सबसे पहले वैराग्यकी आवश्यकता है। संसारके अनित्य भोगोंमें वैराग्य होनेसे ही मनुष्यमें परमात्माको प्राप्त करनेकी शुभेच्छा प्रकट होती है और वह उसके लिये प्रयत्नशील होता है। अतः वैराग्योत्पादनके लिये बार-बार जन्म-मृत्यु और गर्भादिके दुःखोंका प्रदर्शन करानेके लिये पहला पाद आरम्भ किया जाता है। प्रलयके बाद सृष्टि-कालमें उस परब्रह्म परमेश्वरसे जिस प्रकार इस जगत्की उत्पत्ति होती है, उसका वर्णन तो पहले दो अध्यायोंमें किया गया। उसके बाद वर्तमान जगत्में जो जीवात्माके शरीरोंका परिवर्तन होता रहता है, उसके विषयमें श्रुतियोंने जैसा वर्णन किया है, उसपर इस तीसरे अध्यायके प्रथम पादमें विचार किया जाता है। विचारका विषय यह है कि जब यह जीवात्मा पहले शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है, तब अकेला ही जाता है या और भी कोई इसके साथ जाता है। इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं— तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति सम्परिष्वक्तः प्रश्न- निरूपणाभ्याम् ॥ ३ । १ । १ ॥ तदन्तरप्रतिपत्तौ = उक्त देहके बाद देहान्तरकी प्राप्तिके समय (यह जीवात्मा); सम्परिष्वक्तः = शरीरके बीजरूप सूक्ष्म तत्त्वोंसे युक्त हुआ; रंहति = जाता है (यह बात); प्रश्ननिरूपणाभ्याम् = प्रश्न और उसके उत्तरसे सिद्ध होती है।

सूत्र १ ] अध्याय ३ २६३

व्याख्या—श्रुतियोंमें यह विषय कई जगह आया है, उनमेंसे जिस स्थलका वर्णन स्पष्ट है, वह तो अपने-आप समझमें आ जाता है; परंतु जहाँका वर्णन कुछ अस्पष्ट है, उसे स्पष्ट करनेके लिये यहाँ छान्दोग्योपनिषद्के प्रकरणपर विचार किया जाता है। वहाँ यह वर्णन है कि श्वेतकेतु नामसे प्रसिद्ध एक ऋषिकुमार था, वह एक समय पांचालोंकी सभामें गया। वहाँ प्रवाहण नामक राजाने उससे पूछा—'क्या तुम अपने पितासे शिक्षा पा चुके हो?' उसने कहा—'हाँ।' तब प्रवाहणने पूछा—'यहाँसे मरकर यह जीवात्मा कहाँ जाता है? वहाँसे फिर कैसे लौटकर आता है? देवयान और पितृयानमार्गका क्या अन्तर है? यहाँसे गये हुए लोगोंसे वहाँका लोक भर क्यों नहीं जाता?—इन सब बातोंको और जिस प्रकार पाँचवीं आहुतिमें यह जल पुरुषरूप हो जाता है, इस बातको तू जानता है या नहीं?' तब प्रत्येक बातके उत्तरमें श्वेतकेतुने यही कहा—'मैं नहीं जानता।' यह सुनकर प्रवाहणने उसे फटकारा और कहा—'जब तुम इन सब बातोंको नहीं जानते, तब कैसे कहते हो कि मैं शिक्षा पा चुका?' श्वेतकेतु लज्जित होकर पिताके पास गया और बोला कि 'प्रवाहण नामवाले एक साधारण क्षत्रियने मुझसे पाँच बातें पूछीं; किंतु उनमेंसे एकका भी उत्तर मैं न दे सका। आपने मुझे कैसे कह दिया था कि मैं तुमको शिक्षा दे चुका हूँ।' पिताने कहा—'मैं स्वयं इन पाँचोंमेंसे किसीको नहीं जानता, तब तुमको कैसे बताता।' उसके बाद अपने पुत्रके सहित पिता उस राजाके पास गया और धनादिके दानको स्वीकार न करके कहा—'आपने मेरे पुत्रसे जो पाँच बातें पूछी थी, उन्हें ही मुझे बतलाइये।' तब उस राजाने बहुत दिनोंतक उन दोनोंको अपने पास ठहराया और कहा कि 'आजतक यह विद्या क्षत्रियोंके पास ही रही है, अब पहले-पहल आप ब्राह्मणोंको मिल रही है।' यह कहकर राजा प्रवाहणने पहले उस पाँचवें प्रश्नका उत्तर देना आरम्भ किया, जिसमें यह जिज्ञासा की गयी थी कि 'यह जल पाँचवीं आहुतिमें पुरुषरूप कैसे हो जाता है?' वहाँ द्युलोकरूप अग्निमें

२६४ वेदान्त-दर्शन [पाद १ श्रद्धाकी पहली आहुति देनेसे राजा सोमकी उत्पत्ति बतायी है। दूसरी आहुति है मेघरूप अग्निमें राजा सोमको हवन करना; उससे वर्षाकी उत्पत्ति बतायी गयी है। तीसरी आहुति है पृथिवीरूप अग्निमें वर्षाको हवन करना; उससे अन्नकी उत्पत्ति बतायी गयी है। चौथी आहुति है पुरुषरूप अग्निमें अन्नका हवन करना; उससे वीर्यकी उत्पत्ति बतायी गयी है और पाँचवीं आहुति है स्त्रीरूप अग्निमें वीर्यका हवन करना; उससे गर्भकी उत्पत्ति बताकर कहा है कि इस तरह यह जल पाँचवीं आहुतिमें 'पुरुष' संज्ञक होता है। इस प्रकार जन्म ग्रहण करनेवाला मनुष्य जबतक आयु होती है, तबतक यहाँ जीवित रहता है—इत्यादि (छा० उ० ५।३।१ से ५।९।२ तक)। इस प्रकरणमें जलके नामसे बीजरूप समस्त तत्त्वोंके समुदाय सूक्ष्म शरीरसहित वीर्यमें स्थित जीवात्मा कहा गया है; अतः वहाँके प्रश्नोत्तरपूर्वक विवेचनसे यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा जब एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है, तब बीजरूपमें स्थित समस्त तत्त्वोंसे युक्त होकर ही प्रयाण करता है। सम्बन्ध—"इस प्रकरणमें तो केवल जलका ही पुरुष हो जाना कहा है, फिर इसमें सभी सूक्ष्म तत्त्वोंका भी होना कैसे समझा जायगा, यदि श्रुतिको यही बताना अभीष्ट था तो केवल जलका ही नाम क्यों लिया?'' इस जिज्ञासापर कहते हैं— त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ॥ ३।१।२॥ त्र्यात्मकत्वात्=(शरीर) तीनों तत्त्वोंका सम्मिश्रण है, इसलिये (जलके कहनेसे सबका ग्रहण हो जाता है); तु=तथा; भूयस्त्वात्=वीर्यमें सबसे अधिक जलका भाग रहता है, इसलिये (जलके नामसे उसका वर्णन किया गया है)। व्याख्या—जगत्की उत्पत्तिके वर्णनमें कहा जा चुका है कि तीनों तत्त्वोंका सम्मेलन करके उसके बाद परमेश्वरने नाम और रूपको प्रकट किया (छा० उ० ६।३।३)। वहाँ तीन तत्त्वोंका वर्णन भी उपलब्ध है, उसमें सभी तत्त्वोंका मिश्रण समझ लेना चाहिये। स्त्रीके गर्भमें जिस वीर्यका आधान किया जाता है, उसमें सभी भौतिक तत्त्व रहते हैं तथापि जलकी अधिकता होनेसे