भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 486 में से

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पृष्ठ 267

२६४ वेदान्त-दर्शन [पाद १ श्रद्धाकी पहली आहुति देनेसे राजा सोमकी उत्पत्ति बतायी है। दूसरी आहुति है मेघरूप अग्निमें राजा सोमको हवन करना; उससे वर्षाकी उत्पत्ति बतायी गयी है। तीसरी आहुति है पृथिवीरूप अग्निमें वर्षाको हवन करना; उससे अन्नकी उत्पत्ति बतायी गयी है। चौथी आहुति है पुरुषरूप अग्निमें अन्नका हवन करना; उससे वीर्यकी उत्पत्ति बतायी गयी है और पाँचवीं आहुति है स्त्रीरूप अग्निमें वीर्यका हवन करना; उससे गर्भकी उत्पत्ति बताकर कहा है कि इस तरह यह जल पाँचवीं आहुतिमें 'पुरुष' संज्ञक होता है। इस प्रकार जन्म ग्रहण करनेवाला मनुष्य जबतक आयु होती है, तबतक यहाँ जीवित रहता है—इत्यादि (छा० उ० ५।३।१ से ५।९।२ तक)। इस प्रकरणमें जलके नामसे बीजरूप समस्त तत्त्वोंके समुदाय सूक्ष्म शरीरसहित वीर्यमें स्थित जीवात्मा कहा गया है; अतः वहाँके प्रश्नोत्तरपूर्वक विवेचनसे यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा जब एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है, तब बीजरूपमें स्थित समस्त तत्त्वोंसे युक्त होकर ही प्रयाण करता है। सम्बन्ध—"इस प्रकरणमें तो केवल जलका ही पुरुष हो जाना कहा है, फिर इसमें सभी सूक्ष्म तत्त्वोंका भी होना कैसे समझा जायगा, यदि श्रुतिको यही बताना अभीष्ट था तो केवल जलका ही नाम क्यों लिया?'' इस जिज्ञासापर कहते हैं— त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ॥ ३।१।२॥ त्र्यात्मकत्वात्=(शरीर) तीनों तत्त्वोंका सम्मिश्रण है, इसलिये (जलके कहनेसे सबका ग्रहण हो जाता है); तु=तथा; भूयस्त्वात्=वीर्यमें सबसे अधिक जलका भाग रहता है, इसलिये (जलके नामसे उसका वर्णन किया गया है)। व्याख्या—जगत्की उत्पत्तिके वर्णनमें कहा जा चुका है कि तीनों तत्त्वोंका सम्मेलन करके उसके बाद परमेश्वरने नाम और रूपको प्रकट किया (छा० उ० ६।३।३)। वहाँ तीन तत्त्वोंका वर्णन भी उपलब्ध है, उसमें सभी तत्त्वोंका मिश्रण समझ लेना चाहिये। स्त्रीके गर्भमें जिस वीर्यका आधान किया जाता है, उसमें सभी भौतिक तत्त्व रहते हैं तथापि जलकी अधिकता होनेसे