भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 486 में से

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पृष्ठ 266

सूत्र १ ] अध्याय ३ २६३

व्याख्या—श्रुतियोंमें यह विषय कई जगह आया है, उनमेंसे जिस स्थलका वर्णन स्पष्ट है, वह तो अपने-आप समझमें आ जाता है; परंतु जहाँका वर्णन कुछ अस्पष्ट है, उसे स्पष्ट करनेके लिये यहाँ छान्दोग्योपनिषद्के प्रकरणपर विचार किया जाता है। वहाँ यह वर्णन है कि श्वेतकेतु नामसे प्रसिद्ध एक ऋषिकुमार था, वह एक समय पांचालोंकी सभामें गया। वहाँ प्रवाहण नामक राजाने उससे पूछा—'क्या तुम अपने पितासे शिक्षा पा चुके हो?' उसने कहा—'हाँ।' तब प्रवाहणने पूछा—'यहाँसे मरकर यह जीवात्मा कहाँ जाता है? वहाँसे फिर कैसे लौटकर आता है? देवयान और पितृयानमार्गका क्या अन्तर है? यहाँसे गये हुए लोगोंसे वहाँका लोक भर क्यों नहीं जाता?—इन सब बातोंको और जिस प्रकार पाँचवीं आहुतिमें यह जल पुरुषरूप हो जाता है, इस बातको तू जानता है या नहीं?' तब प्रत्येक बातके उत्तरमें श्वेतकेतुने यही कहा—'मैं नहीं जानता।' यह सुनकर प्रवाहणने उसे फटकारा और कहा—'जब तुम इन सब बातोंको नहीं जानते, तब कैसे कहते हो कि मैं शिक्षा पा चुका?' श्वेतकेतु लज्जित होकर पिताके पास गया और बोला कि 'प्रवाहण नामवाले एक साधारण क्षत्रियने मुझसे पाँच बातें पूछीं; किंतु उनमेंसे एकका भी उत्तर मैं न दे सका। आपने मुझे कैसे कह दिया था कि मैं तुमको शिक्षा दे चुका हूँ।' पिताने कहा—'मैं स्वयं इन पाँचोंमेंसे किसीको नहीं जानता, तब तुमको कैसे बताता।' उसके बाद अपने पुत्रके सहित पिता उस राजाके पास गया और धनादिके दानको स्वीकार न करके कहा—'आपने मेरे पुत्रसे जो पाँच बातें पूछी थी, उन्हें ही मुझे बतलाइये।' तब उस राजाने बहुत दिनोंतक उन दोनोंको अपने पास ठहराया और कहा कि 'आजतक यह विद्या क्षत्रियोंके पास ही रही है, अब पहले-पहल आप ब्राह्मणोंको मिल रही है।' यह कहकर राजा प्रवाहणने पहले उस पाँचवें प्रश्नका उत्तर देना आरम्भ किया, जिसमें यह जिज्ञासा की गयी थी कि 'यह जल पाँचवीं आहुतिमें पुरुषरूप कैसे हो जाता है?' वहाँ द्युलोकरूप अग्निमें