वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ३ ] अध्याय ३ २६५ वहाँ उसीके नामसे उसका वर्णन किया गया है। वास्तवमें वह कथन शरीरके बीजभूत सभी तत्त्वोंको लक्ष्य करानेवाला है। एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाते समय जीव प्राणमें स्थित होकर जाते हैं और प्राणको आपोमय (जलरूप) कहा गया है, अतः उस दृष्टिसे भी वहाँ जलको ही पुरुषरूप बताना सर्वथा सुसंगत है। इसलिये यही सिद्ध हुआ कि जीवात्मा सूक्ष्म तत्त्वोंसे युक्त हुआ ही एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातकी पुष्टि करते हैं— प्राणगतेश्च ॥ ३ । १ । ३ ॥ प्राणगतेः = जीवात्माके साथ प्राणोंके गमनका वर्णन होनेसे; च = भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—प्रश्नोपनिषद्में आश्वलायन मुनिने पिप्पलादसे प्राणके विषयमें कुछ प्रश्न किये हैं। उनमेंसे एक प्रश्न यह भी है कि ‘यह एक शरीरको छोड़कर जब दूसरे शरीरमें जाता है, तब पहले शरीरसे किस प्रकार निकलता है?’ (प्र० उ० ३। १) उसके उत्तरमें पिप्पलादने कहा है कि ‘जब इस शरीरसे उदानवायु निकलता है, तब यह शरीर ठण्डा हो जाता है, उस समय जीवात्मा मनमें विलीन हुई इन्द्रियोंको साथ लेकर उदानवायुके सहित दूसरे शरीरमें चला जाता है। उस समय जीवात्माका जैसा संकल्प होता है, उस संकल्प और मन-इन्द्रियोंके सहित यह प्राणमें स्थित हो जाता है। वह प्राण उदानके सहित जीवात्माको उसके संकल्पानुसार भिन्न-भिन्न लोकों (योनियों)-में ले जाता है।’ (प्र० उ० ३। १० तक) इस प्रकार जीवात्माके साथ प्राण और मन-इन्द्रिय आदिके गमनका वर्णन होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि बीजरूप सभी सूक्ष्म तत्त्वोंके सहित यह जीवात्मा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है। छान्दोग्योपनिषद्में जो पहले-पहल श्रद्धाका हवन बताया गया है, वहाँ श्रद्धाके नामसे संकल्पका ही हवन समझना चाहिये। भाव यह कि श्रद्धारूप