भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 486 में से

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पृष्ठ 269

२६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ संकल्पकी आहुतिसे जो उसके सूक्ष्म शरीरका निर्माण हुआ, वही पहला परिणाम राजा सोम हुआ; फिर उसका दूसरा परिणाम वर्षारूपसे मेघमें स्थिति है, तीसरे परिणाममें पहुँचकर वह अन्नमें स्थित हुआ; चौथे परिणाममें वीर्यरूपसे उसकी पुरुषमें स्थिति हुई और पाँचवें परिणाममें वह गर्भ होकर स्त्रीके गर्भाशयमें स्थित हुआ। तदनन्तर वही मनुष्य होकर बाहर आया। इस प्रकार दोनों स्थलोंके वर्णनकी एकता है। प्राणका सहयोग सभी जगह है; क्योंकि गति प्राणके अधीन है, प्राणको जलमय बताया ही गया है। इस प्रकार श्रुतिके समस्त वर्णनकी संगति बैठ जाती है। सम्बन्ध— अब दूसरे प्रकारके विरोधका उल्लेख करके उसका निराकरण करते हैं— अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात्॥ ३।१।४॥ चेत्=यदि कहो कि; अग्न्यादिगतिश्रुतेः=अग्नि आदिमें प्रवेश करनेकी बात दूसरी श्रुतिमें कही है, इसलिये (यह सिद्ध नहीं होता); इति न=तो यह ठीक नहीं है; भाक्तत्वात्=क्योंकि वह श्रुति अन्यविषयक होनेसे गौण है। व्याख्या—यदि कहो, “बृहदारण्यकके आर्तभाग और याज्ञवल्क्यके संवादमें यह वर्णन आया है कि 'मरणकालमें वाणी अग्निमें विलीन हो जाती है, प्राण वायुमें विलीन हो जाते हैं'—इत्यादि (बृह० उ० ३।२।१३) इससे यह कहना सिद्ध नहीं होता कि जीवात्मा दूसरे तत्त्वोंके सहित जाता है, क्योंकि वे सब तो अपने-अपने कारणमें यहीं विलीन हो जाते हैं।” तो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह बात आर्तभागने प्रश्नमें तो कही है, पर याज्ञवल्क्यने उत्तरमें इसे स्वीकार नहीं किया, बल्कि सभासे अलग ले जाकर उसे गुप्तरूपसे वही पाँच आहुतियोंवाली बात समझायी—यह अनुमान होता है; क्योंकि उसके बाद श्रुति कहती है कि 'उन्होंने जो कुछ वर्णन किया, निस्संदेह वह कर्मका ही वर्णन था। मनुष्य पुण्यकर्मोंसे पुण्यशील होता है और पापकर्मसे पापी होता है।' छान्दोग्यके प्रकरणमें भी बादमें यही बात कही गयी है, इसलिये वर्णनमें कोई भेद नहीं। वह श्रुति प्रश्नविषयक होनेसे गौण है, उत्तरकी बात