भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 486 में से

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सूत्र ५-६ ] अध्याय ३ २६७ ही ठीक है। उत्तर इसलिये गुप्त रखा गया कि सभाके बीचमें गर्भाधानका वर्णन करना कुछ संकोचकी बात है; सभामें तो स्त्री-बालक सभी सुनते हैं। सम्बन्ध - पुनः विरोध उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं— प्रथमेऽश्रवणादिति चेन्न ता एव ह्युपपत्तेः ॥ ३ । १ । ५ ॥ चेत्=यदि कहा जाय कि; प्रथमे=प्रथम आहुतिके वर्णनमें; अश्रवणात्= (जलका नाम) नहीं सुना गया है, इसलिये (अन्तमें यह कहना कि पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुष नामवाला हो जाता है, विरुद्ध है); इति न=तो ऐसी बात नहीं है; हि=क्योंकि; उपपत्तेः=पूर्वापरकी संगतिसे (यही सिद्ध होता है कि); ताः एव=(वहाँ) श्रद्धाके नामसे उस जलका ही कथन है। व्याख्या-यदि कहो कि पहले-पहल श्रद्धाको हवनीय द्रव्यका रूप दिया गया है, अतः उसीके परिणाम सब हैं, इस स्थितिमें यह कहना कि पाँचवीं आहुतिमें जल ही पुरुष नामवाला हो जाता है, विरुद्ध प्रतीत होता है। तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि वहाँ श्रद्धाके नामसे संकल्पमें स्थित जल आदि समस्त सूक्ष्मतत्त्वोंका ग्रहण है और अन्तमें भी उसीको जल नामसे कहा गया है, इसलिये कोई विरोध नहीं है। भाव यह कि जीवात्माकी गति उसके अन्तिम संकल्पानुसार होती है और वह प्राणके द्वारा ही होती है तथा श्रुतिमें प्राणको जलमय बताया है अतः संकल्पके अनुसार जो सूक्ष्म तत्त्वोंका समुदाय प्राणमें स्थित होता है, उसीको वहाँ श्रद्धाके नामसे कहा गया है। वह कथन गतिमें संकल्पकी प्रधानता दिखानेके लिये है। इस प्रकार पहले-पहल जो बात श्रद्धाके नामसे कही गयी है, उसीका अन्तिम वाक्यमें जलके नामसे वर्णन किया है; अतः पूर्वापरमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध - पहलेकी भाँति दूसरे विरोधकी उत्थापना करके उसका निराकरण करते हैं— अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणां प्रतीतेः ॥ ३ । १ । ६ ॥ चेत्=यदि ऐसा कहा जाय कि; अश्रुतत्वात् = श्रुतिमें तत्त्वोंके साथ

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