भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 271, कुल 486 में से

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२६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १

जीवात्माके गमनका वर्णन नहीं है, इसलिये (उनके सहित जीवात्मा जाता है, यह कहना युक्तिसंगत नहीं है); इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; इष्टादिकारिणाम्=(क्योंकि) उसी प्रसंगमें अच्छे-बुरे कर्म करनेवालोंका वर्णन है; प्रतीते:=अतः इस श्रुतिमें उन शुभाशुभकारी जीवात्माओंके वर्णनकी प्रतीति स्पष्ट है, इसलिये (उक्त विरोध यहाँ नहीं है)। व्याख्या—यदि कहो कि उस प्रकरणमें जीवात्मा उन तत्त्वोंको लेकर जाता है, ऐसी बात नहीं कही गयी है, केवल जलके नामसे तत्त्वोंका ही पुरुषरूपमें हो जाना बताया गया है, इसलिये यह कहना विरुद्ध है कि तत्त्वोंसे युक्त जीवात्मा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है तो यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि उसी प्रकरणमें आगे चलकर कहा है कि 'जो अच्छे आचरणोंवाले होते हैं वे उत्तम योनिको प्राप्त होते हैं और जो नीच कर्म करनेवाले होते हैं, वे नीच योनिको प्राप्त होते हैं।'* (छा० उ० ५।१०।७) इस वर्णनसे अच्छे-बुरे कर्म करनेवाले जीवात्माका उन तत्त्वोंके साथ एक शरीरसे दूसरे शरीरको प्राप्त होना सिद्ध होता है, इसलिये कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—इसी प्रकरणमें जहाँ सकामभावसे शुभ कर्म करनेवालोंके लिये धूममार्गसे स्वर्गमें जानेकी बात कही गयी है, वहाँ ऐसा वर्णन आता है कि 'वह स्वर्गमें जानेवाला पुरुष देवताओंका अन्न है, देवतालोग उसका भक्षण करते हैं' (बृह० उ० ६।२।१६)। अतः यह कहना कैसे संगत होगा कि पुण्यात्मालोग अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये स्वर्गमें जाते हैं। जब वे स्वयं ही देवताओंके भोग बन जाते हैं तब उनके द्वारा स्वर्गका भोग भोगना कैसे सिद्ध होगा? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भाक्तं वानात्मवित्त्वात्तथा हि दर्शयति ॥ ३।१।७॥ अनात्मवित्त्वात्=वे लोग आत्मज्ञानी नहीं हैं, इस कारण (आत्मज्ञानीकी * तद् य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन्।