वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ७ ] अध्याय ३ २६९ अपेक्षा उनकी हीनता दिखानेके लिये), वा=ही; भाक्तम्=उनको देवताओंका अन्न बतानेवाली श्रुति गौण है; हि=क्योंकि; तथा=उस प्रकारसे (उनका हीनत्व और स्वर्गलोकमें नाना प्रकारके भोगोंको भोगना) भी; दर्शयति=श्रुति दिखलाती है। व्याख्या—वे सकामभावसे शुभ कर्म करनेवाले लोग आत्मज्ञानी नहीं हैं, अतः आत्मज्ञानकी स्तुति करनेके लिये गौणरूपसे उनको देवताओंका अन्न और देवताओंद्वारा उनका भक्षण किया जाना कहा गया है, वास्तवमें तो श्रुति यह कहती है कि 'देवतालोग न खाते हैं और न पीते हैं, इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं।' (छा० उ० ३।६।१)१ अतः इस कथनका यह भाव है कि राजाके नौकरोंकी भाँति वह देवताओंके भोग्य यानी सेवक होते हैं। इस भावके वचन श्रुतिमें दूसरी जगह भी पाये जाते हैं—'जो उस परमेश्वरको न जानकर दूसरे देवताओंकी उपासना करता है, वह—जैसे यहाँ लोगोंके घरोंमें पशु होते हैं, वैसे ही—देवताओंका पशु होता है।' (बृह० उ० १। ४।१०)२ आत्मज्ञानकी स्तुतिके लिये इस प्रकार कहना उचित ही है। इसके सिवा, वे शुभ कर्मवाले लोग देवताओंके साथ आनन्दका उपभोग करते हैं, इसका श्रुतिमें इस तरह वर्णन किया गया है—'पितृलोकपर विजय पानेवालोंकी अपेक्षा सौगुना आनन्द कर्मोंसे देवभावको प्राप्त होनेवालोंको होता है ३।' तथा गीतामें भी इस प्रकार कहा गया है— ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥ 'वे वहाँ विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर पुनः मृत्युलोकमें लौट आते हैं। इस प्रकार वेदोक्त धर्मका आचरण करनेवाले वे १-'न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥' २-'अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते······यथा पशुरेवँस देवानाम्।' ३-अथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः·········स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वमभिसम्पद्यन्ते। (बृह० उ० ४।३।३३)